कंजक पूजन में कन्याओं के पैरों में आलता क्यों लगाया जाता है? सिर्फ परंपरा नहीं, छिपे हैं कई गूढ़ रहस्य
नवरात्र में कन्या पूजन के दौरान कन्याओं के पैरों में आलता लगाने की सदियों पुरानी परंपरा है, जिसे माता दुर्गा ...और पढ़ें

कन्या पूजन में आलता क्यों लगाया जाता है? जानें रहस्य (Picture Credit: AI Generated)
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कन्याओं को माता दुर्गा का साक्षात स्वरूप मानते हैं।
आलता प्रेम, पवित्रता और शुभता का प्रतीक माना जाता है।
यह घर में सकारात्मक ऊर्जा का आह्वान करता है।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। नवरात्र या किसी भी पर्व में पैरों को आलता से सजाने की परंपरा सदियों पुरानी है। मुख्य रूप से सुहागिन महिलाएं व्रत-त्योहार के दौरान पैर में आलता या महावर लगाती हैं। मान्यता है कि आलता लगाने से शरीर की ऊर्जा को स्थिरता मिलती है, जीवन में सकारात्मकता आती है और व्यक्तित्व मजबूत होता है।
वहीं जब शारदीय नवरात्र के दौरान कन्या पूजन की बात आती है तब कन्याओं के पैरों में आलता लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसे पूजन का एक अहम हिस्सा भी माना जाता है। वहीं सवाल यह भी उठता है कि सोलह श्रृंगार की इस सामग्री को कन्या पूजन में इस्तेमाल क्यों किया जाता है। आइए आपको बताते हैं इसके कारणों के बारे में और इसके महत्व के बारे में।
कन्याओं को माना जाता है माता का स्वरूप
नवरात्र में जब कन्या पूजन किया जाता है तब उन्हें सिर्फ आम कन्याएं न मानकर माता दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों से जोड़ा जाता है।
देवी भागवत पुराण के अनुसार कन्याओं को देवी के नौ अलग-अलग स्वरूपों जैसे- कुमारी, त्रिमूर्ति, कल्याणी, रोहिणी के रूप में पूजा जाता है। जब उनका पूजन इन रूपों में किया जाता है तब माता को सोलाज श्रृंगार की एक सबसे जरूरी सामग्री से सजाना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दौरान कन्याओं को आलता लगाने से माता दुर्गा के श्रृंगार के बराबर फल मिलता है।
आलता माता दुर्गा की शक्ति का प्रतीक
आलता का लाल रंग अत्यंत शुभ माना जाता है और जब कन्याओं के पैरों को आलता से रंगा जाता है तब इसे घर की सुख-समृद्धि के रूप में देखा जाता है।
इसके अलावा आलता को प्रेम, पवित्रता और श्रद्धा का प्रतीक भी माना जाता है और इसी वजह से कन्या पूजन में बच्चियों को साक्षात माता दुर्गा का स्वरूप मानकर उनका सम्मान किया जाता है।
चरण पूजन का एक हिस्सा
जब कन्याएं कंजक के अवसर पर घर में प्रवेश करती हैं तब उनके चरणों को पूजने से माता दुर्गा का आशीर्वाद मिलता है। ऐसे में उनके पैरों को आलता से सजाने से पैरों के पूजन का फल कई गुना बढ़ जाता है। यह माता के प्रति सम्मान दिखाने का एक माध्यम माना जाता है और माता दुर्गा का स्वागत घर में करने का एक तरीका भी होता है।
सकारात्मक ऊर्जा का आह्वाहन
आमतौर पर कन्या पूजन के दिन बच्चियों को प्रवेश करने के तुरंत बाद उनके पैर पानी से धोए जाते हैं और उसके बाद उसमें आलता लगाया जाता है। यह इस भावना को दिखाता है कि माता के आगमन के साथ घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश हो सके और घर में समृद्धि और खुशहाली आए।
इस परंपरा से ईश्वरीय शक्ति के साथ एक आध्यात्मिक जुड़ाव भी बना रहता है और माता दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त होता है। जब कन्याओं के नन्हे-नन्हे लाल पैरों को आलता से सजाया जाता है तब यह सीधे माता दुर्गा के आशीर्वाद को उजागर करता है।
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