शारदीय नवरात्र 2026: घटस्थापना के समय क्यों बोए जाते हैं जौ? ब्रह्मा जी से जुड़ा इसका खास रहस्य
शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर से शुरू हो रहे हैं, जिसमें घटस्थापना के समय जौ बोना अत्यंत शुभ माना जाता है। ...और पढ़ें
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शारदीय नवरात्र में जौ बोने की सरल विधि (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
शारदीय नवरात्र में जौ बोना अत्यंत शुभ माना जाता है।
जौ को ब्रह्मा जी द्वारा सृजित पहला अनाज कहते हैं।
यह सुख-शांति और सृष्टि की पूर्णता का प्रतीक है।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। वैदिक पंचांग के अनुसार, शारदीय नवरात्र (Shardiya Navratri 2026) की शुरुआत 11 अक्टूबर से हो रही है। शारदीय नवरात्र के दौरान मां दुर्गा की विशेष पूजा-अर्चना करने का विधान है। साथ ही विधिपूर्वक व्रत किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा की साधना करने से जीवन के सभी दुख दूर होते हैं। शारदीय नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना करने का विधान है।
इस दौरान घटस्थापना के साथ जौ भी बोए जाते हैं। जौ के बर्तन को मंदिर में रखा जाता है और कन्या पूजन के बाद जौ को मिट्टी समेत पवित्र नदी में विसर्जित कर दिया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि शारदीय नवरात्र में जौ क्यों बोए जाते हैं? अगर नहीं, तो आइए इस आर्टिकल में विस्तार से इसके पीछे की वजह जानते हैं।
शारदीय नवरात्र में क्यों बोए जाते हैं जौ?
शारदीय नवरात्र के पहले दिन जौ बोना बहुत ही शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जौ बोने से घर में सदैव सुख-शांति बनी रहती है। साथ ही मां दुर्गा की कृपा परिवार के सदस्यों पर बनी रहती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जौ को पहला अनाज माना जाता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जौ को ब्रह्मा जी का स्वरूप भी कहा जाता है। जब ब्रह्मा जी ने ब्रह्मांड की रचना की थी, तो सबसे पहली वनस्पति और अन्न के रूप में जौ ही उत्पन्न हुआ था। इसे सृष्टि की पूर्णता और शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। इसी वजह से शारदीय नवरात्र के पहले दिन जौ बोने का विशेष महत्व है। इसके बिना घटस्थापना अधूरी मानी जाती है।
जौ बोने की सही विधि
- शारदीय नवरात्र से एक रात पहले जौ को पानी में भिगो दें।
- अगले दिन सुबह स्नान करने के बाद, घटस्थापना के लिए एक मिट्टी के बर्तन में शुद्ध मिट्टी लें।
- बर्तन में मिट्टी की एक परत बिछाकर भीगे हुए जौ के दाने समान रूप से फैलाएं।
- इसके बाद बीजों को मिट्टी की एक बहुत पतली परत से ढक दें।
- अब इसके ऊपर हल्के से पानी का छिड़काव करें।
- इस पात्र को माता रानी की चौकी या कलश के पास स्थापित करें।
- रोजाना इसमें थोड़ा-थोड़ा पानी छिड़कें।
- मां दुर्गा की पूजा के साथ-साथ जौ की भी पूजा-अर्चना करने का विधान है।
- अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन के बाद, इसे पूजा की अन्य सामग्री के साथ पवित्र नदी में विसर्जित कर दें।
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