दीवाली पर सिर्फ पटाखे नहीं, दी जाती है पूर्वजों को विदाई! ओडिशा की ‘बड़ बड़ुआ डाका’ रस्म क्यों है खास?
ओडिशा में दिवाली पर लक्ष्मी पूजन से पहले 'बड़ बड़ुआ डाका' परंपरा निभाई जाती है, जिसमें पूर्वजों को जूट की लकड़ियों से रोशनी दिखाकर विदाई दी जाती है।

लक्ष्मी पूजा से पहले पूर्वजों को विदाई देती है 'बड़ बड़ुआ डाका' रस्म (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
ओडिशा में दिवाली पर लक्ष्मी पूजन से पहले पूर्वजों की पूजा।
'बड़ बड़ुआ डाका' रस्म में जूट की लकड़ियों से रोशनी।
यह परंपरा पूर्वजों को पितृलोक लौटने का मार्ग दिखाती है।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। पूरे देश में दीवाली के अलग-अलग रीति-रिवाज और परंपराएं हैं। भले ही हर क्षेत्र की परंपराएं अलग क्यों न हों, लेकिन कुछ बातें समान हैं जैसे इस दिन घरों को सजाना, दीये जलाना, उपहारों का आदान-प्रदान करना और अच्छे भोजन का आनंद लेना।
जहां उत्तर प्रदेश में दीवाली को पारंपरिक तरीके से दीये जलाकर मनाया जाता है और इस दिन लक्ष्मी पूजन होता है, वैसे ही पश्चिम बंगाल में इस त्योहार को 'काली पूजा' के रूप में मनाया जाता है, जो देवी काली को समर्पित है। तमिलनाडु में लोग घरों के सामने सुंदर 'कोलम' यानी बनाते हैं, जबकि गुजरात में दीवाली को चोपड़ पूजन के रूप में मनाया जाता है। वहीं अगर हम आपसे कहें कि देश की एक ऐसी जगह भी है जहां दीवाली पर देवताओं के पूजन से पहले पूर्वजों की पूजा की जाती है।
जी हां, ओडिशा में, दीवाली की रात 'बड़ बड़ुआ डाका' नाम की एक परंपरा निभाई जाती है। इसमें परिवार के लोग जूट की लकड़ियों को जलाते हैं और अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनकी धरती से विदाई की प्रार्थना करते हैं। आइए आपको बताते हैं, आखिर क्यों खास मानी जाती है यह परंपरा।
क्या है बड़ बड़ुआ डाका की रस्म?
ओडिशा में दीवाली की रात, माता लक्ष्मी के लिए पहला दीपक जलाने से पहले, लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं। यही नहीं इस दिन पूर्वजों के लिए प्रार्थना करने का रिवाज भी सदियों पुराना है। दीवाली वाले दिन शाम ढलते ही,आंगनों से लेकर पुरी के जगन्नाथ मंदिर के बाहर की गलियों तक, हर परिवार का सबसे बड़ा सदस्य घर की दहलीज पर आकर खड़ा हो जाता है। उसके हाथ में सूखी जूट की डंडियों का एक गट्ठर होता है।
वह इन लकड़ियों को जलाता है जो तुरंत आग पकड़ लेती हैं और अंधेरे में रोशनी फैलने लगती हैं। उसके बाद उनमें से एक लकड़ी को आसमान की ओर उठाया जाता है और पूर्वजों के लिए प्रार्थना की जाती है। बड़ बड़ुआ ओड़िया भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है परिवार के दिवंगत बुजुर्ग, पूर्वज या पितर और डाका का अर्थ है पुकारना या बुलाना।
क्यों निभाई जाती है यह रस्म
ऐसा माना जाता है कि दिवाली से पहले के पखवाड़े में पूर्वज पितृलोक से उतरकर पृथ्वी पर अपने परिवारों के बीच आते हैं। अमावस की सबसे अंधेरी रात में, जीवित लोग उनके घर लौटने के लिए रास्ता रोशन करते हैं। इसलिए, देवी लक्ष्मी का स्वागत करने से पहले पूर्वजों को दीये जलाकर विदाई दी जाती है।
बड़ बड़ुआ डाका की रस्म में एक लकड़ी को जलाया जाता है जिसे 'कौन्रिया काठी' कहा जाता है, यह जूट के पौधे का डंठल होता है। इस लकड़ी को जलाने पर मशाल की तरह की तेज रोशनी निकलती है। इस तेज रोशनी का मुख्य उद्देश्य आसमान की तरफ प्रकाश करना होता है जो सीधे पूर्वजों तक जाता है। पूर्वजों को याद करने और उन्हें सम्मान से विदा करने के बाद ही दीवाली लक्ष्मी पूजन होता है।
वास्तव में ओडिशा की ये रस्म खास है और इसे अन्य स्थानों से अलग माना जाता है, इस अवसर पर पूर्वजों को याद करना वास्तव में विशेष महत्व रखता है।
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