कल से शुरू होगा महालक्ष्मी व्रत, 15 दिन तक होगी मां लक्ष्मी की पूजा; नोट करें कलश स्थापना की विधि और मुहूर्त
महालक्ष्मी व्रत 19 सितंबर 2026 से शुरू होकर 3 अक्टूबर 2026 तक चलेगा, जिसमें 15 दिनों तक मां लक्ष्मी की ...और पढ़ें

महालक्ष्मी व्रत 2026 (Picture Credit- AI Generated)
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। महालक्ष्मी व्रत मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए रखा जाने वाला विशेष व्रत है। इस व्रत में 15 दिनों तक माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से महालक्ष्मी व्रत करने से घर में सुख-समृद्धि और धन-धान्य बना रहता है। साल 2026 में यह व्रत 19 सितंबर से शुरू होकर 3 अक्टूबर को समाप्त होगा। व्रत के पहले दिन कलश स्थापना का विशेष महत्व है। आइए जानते हैं महालक्ष्मी व्रत की सही तारीख, कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त और पूजा की सरल विधि।
महालक्ष्मी व्रत 2026 कब से कब तक है ?
वर्ष 2026 में महालक्ष्मी व्रत की शुरुआत 19 सितंबर 2026 शनिवार से होगी और इसका समापन 3 अक्टूबर 2026 शनिवार को होगा।
मुख्य तिथियां इस प्रकार हैं -
- प्रारंभ तिथि: 19 सितंबर 2026, शनिवार (उदया तिथि)
- समापन तिथि: 3 अक्टूबर 2026, शनिवार
- उपवास के दिन: 15 दिन
- अष्टमी तिथि का समय: 18 सितंबर 2026, शुक्रवार, दोपहर 1:00 बजे शुरू होकर 19 सितंबर 2026, शनिवार, दोपहर 3 बजकर 26 मिनट पर समाप्त होगी।
महालक्ष्मी व्रत 2026 कलश स्थापना शुभ मुहूर्त
महालक्ष्मी व्रत मां लक्ष्मी को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है। माना जाता है कि इस व्रत को श्रद्धा और नियम के साथ करने से माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इस दौरान भक्त मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं और व्रत रखते हैं। 19 सितंबर को महालक्ष्मी व्रत के पहले दिन कलश स्थापना की जाती है। इसके लिए शुभ मुहूर्त कुछ इस प्रकार हैं।
- प्रातःकाल मुहूर्त: सुबह 4 बजकर 57 मिनट से 6 बजकर 8 मिनट तक
- दूसरा शुभ मुहूर्त: सुबह 7 बजकर 40 मिनट से लेकर 9 बजकर 11 मिनट तक
- मध्याह्न शुभ मुहूर्त: सुबह 11 बजकर 1 मिनट से लेकर दोपहर 1 बजकर 28 मिनट तक
- इस दिन राहुकाल सुबह 9 बजकर 11 मिनट से लेकर 10 बजकर 43 मिनट तकरहेगा। इस दौरान कलश स्थापना या अन्य शुभ कार्य करने से बचें।
महालक्ष्मी व्रत की पूजा सामग्री
- पूजा के लिए मां लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर, लाल कपड़ा, चौकी, तांबे का कलश, आम के पत्ते और नारियल रखें। इसके अलावा रोली, कुमकुम, चंदन, अक्षत, दूर्वा, लाल या कमल के फूल, धूप, दीपक और शुद्ध देसी घी की जरूरत होगी।
- माता को सोलह श्रृंगार की सामग्री, 16 गांठों वाला सूत या डोरा, फल, मिठाई, खीर या पंचमेवा भी अर्पित किया जा सकता है।
महालक्ष्मी व्रत में कलश स्थापना की विधि
- सबसे पहले सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें और पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करें। एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर मां लक्ष्मी की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें।
- अब तांबे या किसी साफ कलश में शुद्ध जल भरें। इसमें अक्षत और आवश्यकतानुसार कुछ सिक्के डाल सकते हैं। कलश के ऊपर आम के पत्ते लगाएं और उसके मुंह पर नारियल रखें। कलश पर रोली और कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं।
- इसके बाद मां लक्ष्मी का ध्यान करके व्रत का संकल्प लें। माता को फूल, अक्षत, कुमकुम, चंदन और धूप-दीप अर्पित करें। सोलह श्रृंगार की सामग्री और 16 गांठों वाला डोरा भी माता को अर्पित करें। इसके बाद मां लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करें।
- पूजा के दौरान श्री सूक्त और महालक्ष्मी अष्टकम का पाठ करना शुभ माना जाता है। अंत में माता को फल, मिठाई, खीर या पंचमेवा का भोग लगाएं और घी का दीपक जलाकर आरती करें।
महालक्ष्मी व्रत का उद्यापन कैसे करें?
महालक्ष्मी व्रत का समापन 3 अक्टूबर को किया जाएगा। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ या नए वस्त्र पहनकर पूजा की तैयारी करें। इसके बाद माता महालक्ष्मी की पूजा करें। श्री सूक्त और महालक्ष्मी अष्टकम का पाठ करके माता से सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
पूजा पूरी होने के बाद कलश के जल को आम के पत्ते की सहायता से पूरे घर में छिड़क सकते हैं। बचा हुआ जल किसी पवित्र पौधे या वृक्ष के पास डालें। कलश पर रखा नारियल प्रसाद के रूप में बांटें।
कलश विसर्जन का शुभ मुहूर्त
व्रत के अंतिम दिन कलश विसर्जन और पूजा के लिए दिए गए मुहूर्त इस प्रकार हैं:
- प्रातःकाल: सुबह 6 बजकर 15 मिनट से लेकर 10 बजकर 45 मिनट तक
- अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11 बजकर 48 मिनट से लेकर 12 बजकर 35 मिनट तक
अत: कलश विसर्जन के साथ-साथ 16 गांठों वाले सूत या डोरे को माता के सामने रखकर पूजा करने के बाद नदी या बहते जल में प्रवाहित कर दिया जाता है।
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