गले में मुंडमाला, हाथ में खड़ग और कंठ में रक्त: क्या है मां काली के भयानक स्वरूप का असली सच?
हिंदू धर्म में मां काली अत्यंत पूजनीय देवी हैं, जिन्हें समय, प्रलय और मृत्यु की देवी कहा जाता है। उनके ...और पढ़ें

मां काली की उत्पत्ति की कहानी
HighLights
मां काली का विकराल स्वरूप और उनकी पहचान।
रक्तबीज के वध के लिए हुई थी उत्पत्ति।
महादेव के चरणों से शांत हुआ मां काली का क्रोध।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में मां काली अत्यंत पूजनीय देवी हैं, जिन्हें समय, प्रलय और मृत्यु की देवी भी कहा जाता है। देवी काली का जिक्र पहली बार 'देवी महात्मय' में दिखाई देती हैं। आमतौर मां काली को नीली या थोड़ी काली, बाहर लटकती हुई जीभ, एक से अधिक हाथ, इंसानी हाथों से बने वस्त्र, कटे हुए सिरों से बनी हार और एक हाथ में कटा हुआ सिर लिए चित्रित किया जाता है।
मां काली को काली माता, माता जगदंबा, श्मशान की देवी, महाकाली की काली, भयानक अंधकार की देवी, माता कालिका आदि कई नामों से जाना जाता है। हिंदू धर्म शास्त्रों के मुताबिक, मां काली को देवी दुर्गा के 10 महाविद्याओं में से एक माना जाता है। मां दुर्गा ने दुष्ट और आसुरी शक्तियों का नाश करने के लिए विकराल रूप धारण किया था, जिसे दुनिया 'मां काली' के नाम से जानती है। माना जाता है कि जो भी भक्त मां काली की सच्चे मन से पूजा-आराधना करता है, उसे कभी भी डर या बुरी नजर नहीं सताती है।
मां काली का मतलब
'काली' शब्द के 2 अर्थ है, काल और काला रंग। भगवान शिव के क्रोधित रूप की वजह से उनके तीसरे नेत्र से उत्पन्न हुई मां काली को काला रंग मिला था और 'काल' का अर्थ समय है, तो 'काली' का अर्थ है, समय और काल, जो सभी को अपने में समा लेता है। आज तक कोई भी काल के समय को टाल नहीं पाया है।
मां काली के सिर्फ हुंकार भर से ही असुरों की सेना जल कर राख हो गई थी और मां के गुस्से की आग से तीनों लोक जल उठे थे।

मां काली की उत्पत्ति कैसे हुई थी?
मां पार्वती जिन्हें मां जगदंबा के शुंभ-निशुंभ से युद्ध के दौरान रक्तबीज नाम का असुर जिसको मारने के लिए काली का अवतार लिया था। रक्तबीज को वरदान हासिल था कि उसके खून की एक बूंद भी जहां भी गिरेगी वहीं पर उसके जैसे बलशाली दानव पैदा हो जाएंगे, ताकि कोई भी इतनी आसुरी शक्तियों से न लड़ पाए और न ही उसे हरा पाएं। रक्तबीज को लगा था कि इस वरदान से वो अमर हो गया है, उसे कोई भी नहीं मार पाएगा।
फिर मां काली ने रक्तबीज के खून को अपने कंठ में धारण कर लिया एक भी बूंद को जमीन पर गिरने नहीं दिया।
इसी से मां काली की जिह्वा सुर्ख लाल हो गई और उन्हें असुरों की खून की प्यासी भी कहा गया। रक्तबीज को मारने के बाद महाकाली ने इतना विकराल रूप धारण कर लिया था कि उनका गुस्सा शांत नहीं हो रहा था। उनको शांत करना भी जरूरी था। लेकिन सब उनके पास जाने से डर रहे थे। तब सभी देवतागण महादेव की शरण में पहुंचे और उनके मां काली को शांत करने की गुहार लगाई।
महादेव महाकाली को शांत करने की सभी कोशिशें प्रयासों में विफल रहे। इसके बाद भगवान शिव मां काली के मार्ग में लेट गए और गुस्से में आगे बढ़ रही मां काली के चरण उनके सीने से स्पर्श हो गए, जिसके बाद उनकी जीभ बाहर आई और उनका गुस्सा शांत हो गया।
मां काली का रूप
हिंदू धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, मां काली का स्वरूप गले में खोपड़ियों और कटे हुए मुंडों की माला, कंठ में कराल विष का चिन्ह, अनेकों भुजाओं में कई अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए है। उनकी असुरों के रक्त से सुर्ख लाल जिह्वा गर्म खून के लिए प्यासी बाहर की ओर लटकती है।
वैसे तो मां काली के कई रूप बताए गए हैं, लेकिन 4 प्रमुख रूप ऐसे हैं जिनकी श्रद्धा-भाव से पूजा-अर्चना की जाती है।
- दक्षिणा काली
- श्मशान काली
- मातृ काली
- महाकाली
मां काली की खास पूजा
वैसे तो मां काली पूजा पूरे भारत में की जाती है लेकिन बंगाल और असम में मां काली को खासतौर से पूजाजाता है। साल के कुछ खास मौकों पर बड़े-बड़े पंडाल लगाए जाते हैं और कई दिनों तक मां काली की पूज का उत्सव मनाया जाता है।
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