नाविक का जहाज डूबने से लेकर मछली के भोग तक: कोलकाता के कालीघाट मंदिर से जुड़ी ये बातें कर देंगी हैरान
कोलकाता का कालीघाट मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहां देवी सती के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था। ...और पढ़ें

51 शक्तिपीठों में से एक कोलकाता का ऐतिहासिक कालीघाट मंदिर

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। कोलकाता का कालीघाट मंदिर जो देशभर के अन्य मां काली के मंदिर से थोड़ा अलग है। इस मंदिर का निर्माण करीब 15वीं शताब्दी के आस पास हुआ था, लेकिन कुछ स्रोतों में इसे 12वीं शताब्दी से पहले का बताया जाता है।
मां काली का यह मंदिर उन 51 शक्तिपीठों में शामिल है, जहां देवी सती के अंग गिरे थे, जब उन्होंने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह किया था। इस स्थान पर देवी सती के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था, इसीलिए यहां पर मंदिर की स्थापना की गई।

नाविक जिसे मां काली की मूल प्रतिमा मिली
इस मंदिर का नाम 'कालीघाट' जो संस्कृत के काली घाट से लिया गया है, जिसका अर्थ है 'काली का आगमन स्थल।' बताया जताया है कि, एक बार आत्मराम ब्रह्मचारी नाम का एक भक्त हुगली नदी में नौका विहार कर रहा था।
तभी उन्होंने नदी के किनारे से एक तेज रोशनी को निकलते देखा। उन्होंने उस रोशनी का पीछा किया और काली को की एक पत्थर की मूर्ति देखी, जिसे उन्होंने एक छोटी कुटिया में स्थापित किया है और उसकी पूजा करना शुरू कर दी। समय बीतने के साथ यह लोकप्रिय तीर्थस्थल बना गया।
देवी काली को दो देवियों के रूप में पूजा जाता है
कोलकाता के कालीघाट मंदिर में देवी काली की एक ही मूर्ति को दुर्गा पूजा के अवसर पर मां चामुंडा और दीवाली के मौके पर मां लक्ष्मी के रूप में पूजा जाता है। साल के सामान्य दिनों में देवी काली को भोग में चावल-दाल, मछली, झींगा और बकरे के मांस का भोग लगाया जाता है, जबकि दीवाली के मौके पर खास पूजा के दौरान देवी को सात्विक और शकाहारी भोग चढ़ाया जाता है।
दोपहर के समय में देवी को भोग अर्पित करते समय गर्भगृह का दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। इस दौरान मंदिर में आने वाले श्रद्धालु और जरूरतमंदों को भोजन भी कराया जाता है।
-1792121053006.webp)
मां काली की अनोखी प्रतिमा
कालीघाट मंदिर का मुख्य आकर्षण देवी काली की प्रतिमा भी है, जो भारत में मां काली की अन्य सभी प्रतिमाओं से थोड़ी अलग है। काले पत्थर से निर्मित इस मूर्ति में तीन विशाल आंखें, एक लंबी उभरी हुई जीभ और चार हाथ हैं।
दो हाथ में मां काली तलवार और कटा हुआ सिर धारण किए हुए हैं, जो बुराई को खत्म करने और उनकी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। जबकि अन्य दो हाथों में कमल और धारण किए मां अपने भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करती हैं। मां की प्रतिमा को सोने और चांदी के आभूषणों से सजाया गया है और उनके गले में एक सांप लिपटा हुआ है।
कालीघाट की मां काली की यह प्रतिमा इसलिए भी खास क्योंकि इसमें उन्हें क्रूर और भयानक नहीं बल्कि दयालु और मातृत्व रूप में दर्शाया गया है। मां काली की मूर्ति इसलिए भी खास है क्योंकि इसे मनुष्य द्वारा नहीं, बल्कि दैवीय हस्तक्षेप द्वारा बनाया गया है।
मां काली की प्रतिमा किसने चुराई थी
बताया जाता है कि, काफी समय पहले एक बार काली की मूल पत्थर की मू्र्ति एक पुर्तगाली नाविक ने चुरा ली थी, जो इसे विदेश में बेचने की योजना में था। लेकिन जैसा ही वह जहाज में मूर्ति को लेकर चढ़ा अचानक से एक तूफान आ गया और जहाज डूबने लगा।
नाविक ने खुद को बचाने की उम्मीद में मूर्ति को पानी में फेंक दिया लेकिन फिर भी वह बच नहीं सका। मूर्ति बहकर किनारे पर आ गई, जहां उसे रामकृष्ण परमहंस नामक एक संत ने पाया जो मां काली के महान भक्त थे। उन्होंने मूर्ति को मंदिर में ले जा एक मूर्तिकार से इसे एक सुंदर मूर्ति में तराशने का अनुरोध किया।
इस मंदिर स्वामी विवेकानंद ने भी अपने मन्नत पूरी होने पर मां काली की पूजा करने के साथ मंदिर की 7 परिक्रमा भी की थी।
Source- incredibleindia
यह भी पढ़ें- उत्तराखंड का रहस्यमयी मां कोटगाड़ी मंदिर, जहां चिट्ठी और स्टाम्प पेपर पर लिखकर अर्जी लगाने से मिलता है न्याय
यह भी पढ़ें- सप्तश्रृंगी देवी मंदिर: यहां गिरी थी माता सती की भुजा, 18 हाथों वाली देवी का अनोखा इतिहास
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।
