सप्तश्रृंगी देवी मंदिर: यहां गिरी थी माता सती की भुजा, 18 हाथों वाली देवी का अनोखा इतिहास
महाराष्ट्र के सह्याद्री पहाड़ियों में स्थित वाणी का सप्तश्रृंगी देवी मंदिर एक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ है, जो अपनी पौराणिक कथाओं और दिव्य अनुष्ठानों के लिए प्रसिद्ध है।

सप्तश्रृंगी मंदिर की कथा और धार्मिक महत्व

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। महाराष्ट्र के सह्याद्री पहाड़ियों पर बसा है वाणी मंदिर जो मां सप्तश्रृंगी को समर्पित है। समुद्र तल से करीब 4,659 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर सात पर्वत चोटियों से घिरा हुआ है, जिसके कारण इसे 'सप्तश्रृंगी' भी कहा जाता है, जिसका मतलब 'सात चोटियां' हैं। महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में से एक होने के कारण यह पवित्र तीर्थस्थल देशभर से यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए बेहद खास धार्मिक स्थल माना जाता है।
मंदिर का रहस्यमय वातावरण और इसकी मनोरम स्थिति इसे श्रद्धालुओं और प्रकृति प्रेमियों दोनों के लिए एक अनिवार्य दर्शनीय स्थल बना देती है।
मंदिर का इतिहास
इस मंदिर की उत्पत्ति हिंदू पौराणिक कथाओं से गहराई से जुड़ी हुई है, जो भारत के सबसे खास आध्यात्मिक स्थलों में से एक मानी जाती है। प्राचीन ग्रंथों के मुताबिक, सप्तश्रृंगी पहाड़ियों को शक्तिपीठ माना जाता है, जहां भगवान शिव के शोक में तांडव के बाद देवी सती का दाहिना हाथ गिरा था। इस दिव्य घटना ने मंदिर को पवित्र कर दिया, जिससे इसका आध्यात्मिक महत्व कई गुना तक बढ़ गया।
एक अन्य प्रचलित कथा के मुताबिक, यह मंदिर महिषासुर मर्दिनी से जुड़ा माना जाता है, जो देवी दुर्गा का ही एक शक्तिशाली रूप है। माना जाता है कि देवी ने महिषासुर राक्षस का नाश करने के लिए यहां 18 भुजाओं के साथ प्रकट हुई थी। उनके प्रत्येक हाथ में दिव्य शस्त्र हैं। जिस जगह पर यह युद्ध हुआ था. वहीं पर आज मंदिर स्थित है, जो इस विश्वास को और भी मजबूत कर देता है कि देवी आज भी अपने भक्तों को बुरी शक्तियों से बचाती हैं। एक समय मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 500 से ज्यादा सीढ़ियां चढ़नी पड़ती थी।
मंदिर से जुड़े पवित्र अनुष्ठान
सप्तश्रृंगी देवी मंदिर में उपासना करना एक दिव्य अनुभव से जुड़ा है, जो पवित्र अनु्ष्ठानों और गहरी भक्ति से भरा है। दिन की शुरुआत भोग मंगला आरती से होती है, जिसमें भजनों और प्रार्थनाओं से देवी को जागृत किया जाता है। दिन भर अभिषेक, अलंकरण और अनेक आरतियां होती रहती हैं, जिससे भक्तों को देवी की दिव्य उपस्थिति का प्रत्यक्ष अनुभव मिलता है।
मार्च-अप्रैल में मनाए जाने वाले चैत्र नवरात्र के दौरान मंदिर की रौनक मन मोहक होती है। इस भव्य उत्सव में हजारों श्रद्धालु देवी का आशीर्वाद प्राप्त लेने के लिए मंदिर में आते हैं। मंदिर को रंग-बिरंगे सजावटों से सजाया जाता है और पारंपरिक संगीत और नृत्य से सजी शोभायात्राएं निकाली जाती हैं। एक अन्य मौका शारदीय नवरात्र में भी देखने को मिलता है।
सप्तश्रृंगी मंदिर दर्शन के लिए सबसे अच्छा समय
सप्तश्रृंगी देवी मंदिर घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च के बीच का है, जब मौसम सुहाना और आरामदायक होता है, जिससे ट्रेकिंग करना और पहाड़ की चोटी से मनमोहक दृश्यों का आनंद लेना आसान हो जाता है।
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