चिंतपूर्णी माता मंदिर की कथा: कैसे हुई इस शक्तिपीठ की खोज, मां दुर्गा ने भक्त को सपने में दिए थे दर्शन
हिमाचल प्रदेश के ऊना में स्थित चिंतपूर्णी माता मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहां माता सती के चरण ...और पढ़ें

चिंतपूर्णी माता मंदिर का रहस्य

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में मां सती के 51 शक्तिपीठों को देवी उपासना के लिए पवित्र केंद्र माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता सती के आत्मदाह करने के बाद जब भगवान शिव उनके मृत शरीर को लेकर वियोग में ब्रह्मांड में भ्रमण कर रहे थे, तो भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता के शरीर को 51 हिस्सों में काट दिया था।
जहां-जहां माता सती के अंग, वस्त्र या आभूषण गिरे, वे स्थान 'शक्तिपीठ' कहलाए। वैसे तो माता सती के सभी शक्तिपीठों का विशेष महत्व है, लेकिन इन्हीं में से एक प्रमुख शक्तिपीठ हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में स्थित चिंतपूर्णी माता का मंदिर (Chintpurni Mata Temple) है। मान्यता के अनुसार, इस पवित्र जगह पर माता सती के पांव गिरे थे। यहां पर देवी के दर्शन करने से भक्त की सभी चिंताएं दूर होती हैं।
शारदीय नवरात्र के दौरान इस मंदिर में दूर-दूर से भक्त चिंतपूर्णी माता के दर्शन और पूजा करने के लिए आते हैं। माता चिंतपूर्णी को माता छिन्नमस्तिका का रूप भी माना जाता है। शारदीय नवरात्र के समय इस मंदिर में बेहद खास रौनक देखने को मिलती है। यहां चिंतपूर्णी माता की पिंडी रूप में पूजा की जाती है। ऐसे में आइए इस आर्टिकल में आपको इस मंदिर से जुड़ी कुछ खास जानकारियां विस्तार से बताते हैं।
चिंतपूर्णी माता मंदिर से जुड़ी कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, 14वीं शताब्दी में माई दास नाम के व्यक्ति ने इस पवित्र जगह की खोज की थी। माई दास जी के दो बड़े भाई थे दुर्गादास और देवीदास। माई दास मां दुर्गा के परम भक्त थे और उनकी बहुत पूजा-पाठ करते थे। एक बार जब माई दास जी अपने ससुराल जा रहे थे, तो मार्ग में थकान दूर करने के लिए वे कुछ समय के लिए एक वट वृक्ष के नीचे आराम करने बैठ गए।
कुछ ही देर में उनकी आंख लग गई। इस दौरान मां दुर्गा ने उन्हें सपने में दर्शन दिए और उसी वट वृक्ष के नीचे अपनी पिंडी स्थापित करने का आदेश दिया। सपने में मां दुर्गा ने कहा कि मेरी पूजा करने से तुम्हारे सभी दुख दूर होंगे। इसके बाद ससुराल से वापस आते समय माई दास उसी पेड़ के नीचे बैठ गए और मां दुर्गा का स्मरण करने लगे। इस दौरान उन्हें सिंहवाहिनी दुर्गा के दर्शन हुए। देवी ने उनसे कहा कि मैं इस वृक्ष के नीचे चिरकाल से विराजमान हूं।
मां दुर्गा ने उन्हें आदेश दिया कि तुम किसी भी जगह जाकर कोई शिला उखाड़ो, वहां से जल निकल आएगा और उसी जल से तुमको मेरी पूजा करनी होगी। आज भी उस पेड़ के नीचे मां चिंतपूर्णी का भव्य मंदिर है और वह शिला भी मंदिर में विराजमान है।
कैसे पड़ा छिन्नमस्तिका नाम?
मार्कण्डेय पुराण में बताया गया है कि माता चंडी द्वारा सभी दुष्टों पर विजय प्राप्त करने के बाद, उनके दो शिष्यों (अजय और विजय) ने माता से अपनी खून की प्यास बुझाने की प्रार्थना की थी। देवी ने अपने शिष्यों की इस प्रार्थना को स्वीकार किया और अपना ही शीश धड़ से अलग कर लिया। इसी वजह से देवी का नाम छिन्नमस्तिका (छिन्नमस्ता) पड़ा।
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source- hpuna.nic.in
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