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गर्भधारण से सुरक्षित प्रसव तक: तमिलनाडु के इस प्राचीन मंदिर का घी और तेल प्रसाद क्यों है इतना खास?

Published: Tue, 06 Oct 2026 02:23 PM (IST)

तमिलनाडु के थिरुकरुकावुर में स्थित गर्भरक्षाम्बिगाई मंदिर संतान प्राप्ति और सुरक्षित प्रसव के लिए प्रसिद्ध है। यहां निःसंतान दंपतियों को ...और पढ़ें

गर्भरक्षमबिगई मंदिर (गर्भ की रक्षा करने वाली देवी)

गर्भरक्षमबिगई मंदिर (गर्भ की रक्षा करने वाली देवी)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भारत के तमिलनाडु राज्य के थिरुकरुकावुर में स्थित है गर्भरक्षाम्बिगाई मंदिर, भगवान शिव का प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर सुंदर वैगई नदी के तट पर स्थित है। इस मंदिर की सबसे खास बात जो इसे देशभर के अन्य मंदिरों से अलग बनाती है, वह यह है कि यहां देवी गर्भरक्षंबिगई अम्मन महिलाओं की संतान प्राप्ति की इच्छा को पूरा करने के साथ, उन्हें गर्भधारण का भी आशीर्वाद देती है और सुरक्षित एवं सुगम प्रसव (Childbirth) में मदद करती हैं।

गर्भरक्षाम्बिगाई मंदिर में स्वामी (भगवान शिव), विनायक (श्रीगणेश) और नंदी स्वयंभू रूप में विराजमान हैं। इस मंदिर में भगवान शिव का अभिषेक करने के बजाय उन्हें खास तरह का लेप (पुनुगु सट्टम) लगाया जाता है, यह सिर्फ 'वलरपिराई प्रदोषम' (शुक्ल पक्ष के प्रदोष) के दिन किया जाता है। मंदिर में निःसंतान लोग आकर प्रार्थना करते हैं, तो उन्हें संतान की प्राप्ति होती है।

गर्भ की रक्षा करने वाली देवी 

संस्कृत में अम्बल (देवी) का नाम 'गर्भरक्षांबिका' है, जिसका मतलब 'करुगाथा नायकी' यानी (गर्भ की रक्षा करने वाली देवी) कहा जाता है। इस मंदिर में अम्बल देवी के गर्भगृह में सीढ़ियों पर घी लगाया जाता है और बचता हुए घी देवी के चरणों में अर्पित किया जाता है।

मंदिर की परंपरा के मुताबिक दंपत्ति को आधा किलो घी मिलाकर 48 दिनों तक खाना होता है, जिससे उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।

इसके अलावा गर्भवती महिला को अरंडी का तेल (कैस्टर ऑयल) दिया जाता है। प्रसव के समय पेट पर इसकी मालिश करने से सुरक्षित और बिना किसी परेशानी के प्रसव होता है। इस मंदिर का उल्लेख पेरियापुराणम, उमापति शिव द्वारा रचित 'शिवक्षेत्र शिवनामक कलीवेनपा' और रामलिंग अडिकलार के 'विन्नप्पकली वेनपा' में मिलता है।

मंदिर से जुड़ी प्रसादम परंपराएं

इस मंदिर में खासतौर पर दो तरह की प्रसाद परंपराएं प्रसिद्ध हैं। इसमें गर्भधारण करने वाले दंपतियों के लिए घी और गर्भावस्था के दौरान प्रार्थना करने वाली महिलाओं के लिए तेल का प्रसाद दिया जाता है। ये भक्तिपूर्ण परंपराएं हैं न कि चिकित्सीय उपचार।

घी प्रसादम परंपरा

संतान प्राप्ति की प्रार्थना करने वाली दंपत्तियों को परंपरागत रूप से प्रसाद के रूप में थोड़ी मात्र में घी दिया जाता है। पूजा के दौरान घी को श्री गर्भरक्षंबिगई अम्मन के चरणों में अर्पित किया जाता है और प्रसाद के रूप में भक्तों को वापस दे दिया जाता है।

घर लौटने के बाद मंदिर के घी प्रसाद परंपरा के अनुसार गाय के घी में मिलाकर दंपति 48 दिनों तक सेवन करती है। यह संतान प्राप्ति के आशीर्वाद के लिए देवी गर्भरक्षंबिगई से प्रार्थना करने से जुड़ी एक भक्तिमय प्रथा है।

दंपति 48 दिनों की अवधि के दौरान देवी की प्रार्थना करते वक्त पारंपरिक गर्भरक्षांबिगई श्लोकों का जाप कर सकते हैं।

ऊं गर्भरक्षाम्बिकायै च विद्महे,

मंगल देवतायै च धीमहि,

तन्नौ देवी प्रचोत्यात्।

तेल प्रसादम परंपरा

अम्मान के चरणों में परंपरागत रूप से अर्पित की जाने वाली अरंडी के तेल की छोटी बोतल गर्भवती महिलाओं को भेंट की जाती है। पूजा के दौरान तेल को श्री गर्भरक्षंबिगई अम्मन के चरणों में रखा जाता है औ प्रसाद के रूप में भक्तों को लौटा दिया जाता है।

इस तेल को पारंपरिक रूप से गर्भावस्था के दौरान पेट पर थोड़ी मात्रा में लगाया जाता है। महिलाएं प्रसव पीड़ा होने पर भी इसे लगाती हैं। यह एक धार्मिक प्रथा है, जो मां और बच्चे की सुरक्षा और सुरक्षित प्रसव के लिए की जाती है।

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source- garbarakshambigai.org

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