दिन में 8 बार बदले जाते हैं वस्त्र और श्रृंगार, 7 साल के 'बाल कृष्ण' का ऐसा है यह अनोखा धाम
राजस्थान के नाथद्वारा में स्थित श्रीनाथजी मंदिर भगवान श्रीकृष्ण के 7 वर्षीय बाल रूप को समर्पित है, जहां वे गोवर्धन ...और पढ़ें

अष्टयाम दर्शन श्रीनाथजी

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। राजस्थान के नाथद्वारा में स्थित है 'श्रीनाथजी मंदिर' जो भगवान श्रीकृष्ण के 7 वर्षीय बालक रूप श्रीनाथ जी को समर्पित अत्यंत पूजनीय मंदिर है, जिसमें वे गोवर्धन पर्वत को उठाए हुए हैं।
इस मंदिर की स्थापना 1672 ईस्वी में की गई थी, जब मुगल सम्राट औरंगजेब के मूर्ति को नुकसान से बचाने के लिए मूर्ति को मथुरा से लाया जा रहा था।
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, नाथद्वारा में देवता को ले जाते समय रथ कीचड़ में फंस गया था, जिसे भगवान की वहां स्थायी रूप से रहने की इच्छा के रूप में समझा गया। मंदिर में स्थित भगवान श्रीकृष्ण की बाल स्वरूप मूर्ति बेहद खास और अनोखी है,क्योंकि इसमें कृष्ण को बायां हाथ ऊपर उठाए हुए, अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत धारण किए हुए दिखाया गया है।
श्रीनाथजी मंदिर में 8 प्रहर सेवा का अनुष्ठान
श्रीनाथजी मंदिर अपने दैनिक सेवा अनुष्ठान के लिए काफी प्रसिद्ध है, जो दिन में 8 बार किए जाते हैं, और हर बार देवता को अलग-अलग कपड़े और सजावट से उनका श्रृंगार किया जाता है।
मंदिर में दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को दिन में सिर्फ कुछ तय समय पर ही गर्भगृह में प्रवेश करने की अनुमति दी जाती है। मंदिर में उन्हें सात साल के बच्चों की ही तरह खेलने और आराम करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाता है।

श्रीनाथजी भगवान अष्टयाम दर्शन और श्रृंगार
मंगला दर्शन- श्रीनाथजी भगवान के दर्शन दिन में 8 बार होते हैं। जिसमें सबसे पहले 'मंगला दर्शन' है, जो सुबह होता है और भगवान कृष्ण के लिए एक मधुर चेतावनी का काम करता है, क्योंकि शंखों मधुर ध्वनि से वे जागते हैं।
श्रृंगार दर्शन- मंगल दर्शन के ठीक एक घंटे बाद श्रृंगार आरती की जाती है, जिसमें श्रीनाथजी को रेशमी कपड़ों और आभूषणों से सजाया जाता है, उन्हें इसके लिए दिन में तैयार किया जाता है। श्रृंगार होने के बाद श्रीनाथजी के सामने सोने का दर्पण रखा जाता है, ताकि वे अपने आपको निहार सकें।
ग्वाल दर्शन- श्रृंगार दर्शन के बाद ग्वाल दर्शन किया जाता है, जो आमतौर पर श्रद्धालुओं के लिए खुला नहीं होता है। भगवान श्रीकृष्ण को गाय चराना काफी पसंद था, इसलिए इस समय वे गायों को चराने वाले बाल रूप में दिखाई देते हैं। उसी हिसाब से उन्हें हल्के कपड़े भी पहनाए जाते हैं।
राजभोग दर्शन- यह पूरे दिन का सबसे खास और बड़ा दर्शन माना जाता है। इसमें प्रभु को सुंदर-सुंदर फूलों की माला पहनाई जाती है और वे शाही भोज में भाग लेते हैं। चूंकि श्रीनाथजी अभी बालक हैं तो उनके भोजन में मिर्च-मसाले का इस्तेमाल करने से बचा जाता है। भोजन के बाद वे स्वाभाविक रूप से काफी थक जाते हैं और दोपहर की लंबी नींद के बाद आराम करते हैं। इस दौरान मंदिर को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाता है।
उत्थापन दर्शन- दोपहर ढलने के बाद श्रीनाथजी को नींद से जगाने के लिए वीणा की मधुर ध्वनि सुनाई जाती है। इस दौरान माना जाता है कि बाल कृष्ण नींद से अभी भी सुस्त है, इसलिए मंदिर में शांतिपूर्ण और शांत वातावरण बनाए रखा जाता है।
भोग दर्शन- इस दर्शन के दौरान श्रीनाथजी को हल्का भोजन या फल अर्पित किया जाता है। श्रीनाथ जी अन्य देवी-देवताओं से संवाद करते हैं और व्यक्ति इस दौरान श्रीनाथ प्रभु से प्रार्थना करके अपनी मनोकामना पूरी करने का अनुरोध करना चाहिए।
संध्या आरती- इसके बाद शाम को श्रीनाथजी के लिए भोग की तैयारी करने के साथ प्रभु श्रीनाथ जी का विशेष श्रृंगार किया जाता है।
शयन दर्शन- रात के वक्त भगवान श्रीकृष्ण दिन भर के काम, खेलकूद और मस्ती के बाद आखिर में शयन दर्शन के लिए तैयार होते हैं। इसमें नींद से भरी आंखें वाले नन्हे बालक को लोरी सुनाई जाती है।
एक आलीशान कालीन उनके कमर तक जाता है, जहां खास विश्राम के लिए सोने का पलंग तैयार किया जाता है। सभा कक्ष के भव्य द्वार अब खुले छोड़ दिए जाते हैं क्योंकि सभी रखवाले आखिरकर निश्चिंत हो गए हैं। नन्हे भगवान सो रहे हैं और भागने की कोशिश नहीं करेंगे।
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