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    Importance Of Aarti: जानें, क्यों पूजा के बाद आरती की जाती है और क्या है इसका धार्मिक महत्व

    By Pravin KumarEdited By:
    Updated: Thu, 27 Oct 2022 09:56 AM (IST)

    Importance Of Aarti सनातन शास्त्रों में दिन में पांच बार आरती करने का विधान है। आरती करते वक्त साधक का मन स्थिर रहना चाहिए। मन में भगवान की भक्ति की भ ...और पढ़ें

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    Importance Of Aarti: जानें, क्यों पूजा के बाद आरती की जाती है और क्या है इसका धार्मिक महत्व

    नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क | Importance Of Aarti: सनातन धर्म में ईश्वर प्राप्ति का सरल मार्ग भक्ति है। शास्त्रों में निहित है कि महज भक्ति कर व्यक्ति अपने आराध्य देव के शरणागत हो सकता है। भगवान की विशेष कृपा अपने भक्तों पर पड़ती है। भक्ति में पूजा पाठ और व्रत करने का विधान है। वहीं, पूजा का समापन आरती से होती है। लेकिन क्या आपको पता है कि क्यों पूजा के अंतिम में आरती की जाती है ? धर्म पंडितों की मानें तो आरती भी उपासना की विधि है। इस अवसर पर थाली में घी, कपूर और बाती जलाकर भगवान की आरती उतारी जाती है। आइए, भगवान की आरती उतारने के धार्मिक महत्व को विस्तार से जानते हैं-

    धार्मिक महत्व

    सनातन धर्म शास्त्र विष्णु पुराण में ईश्वर की आरती करने का महत्व विस्तार से बताया गया है। शास्त्र में आरती को लेकर कई श्लोक वर्णित हैं। इनमें एक श्लोक है-

    यथैवोध्र्वगतिर्नित्यं राजन: दीपशिखाशुभा।

    दीपदातुस्तथैवोध्र्वगतिर्भवति शोभना।

    इसका भावार्थ यह है कि जिस प्रकार आरती के समय दीप-ज्योति ऊध्र्व गति से प्रकाशमान रहती है। उसी प्रकार आरती करने वाले और ग्रहण करने वाले साधक के मन में आध्यात्मिक जागृत होती है। साथ ही साधक की आध्यात्मिक दृष्टि उच्चतम स्तर तक पहुंचते हैं। एक अन्य श्लोक में भी आरती करने का महत्व बताया गया है।

    नीरांजन बर्लिविष्णोर्यस्य गात्राणि संस्पृशेत्।

    यज्ञलक्षसहस्त्राणां लभते सनातन फलम्।।

    इस श्लोक का भावार्थ यह है कि आरती करने वाले साधक को हजारों यज्ञ करने के समतुल्य अक्षय फल की प्राप्ति होती है।

    आरती के प्रकार

    -दीपमाला आरती

    -जल से भरे शंख द्वारा आरती

    - धुले हुए वस्त्र द्वारा आरती

    - आम और पीपल आदि के पत्तों द्वारा आरती

    -साष्टांग आरती

    आरती करने की सही विधि

    आरती करते वक्त साधक का मन स्थिर रहना चाहिए। मन में भगवान की भक्ति की भावना होनी चाहिए। अंतर्मन से ईश्वर का स्मरण करने को पंचारती आरती कहते हैं। सनातन शास्त्रों में दिन में पांच बार आरती करने का विधान है। इसके लिए पूजा की थाली में शुद्ध घी में लिपटी विषम संख्या में बत्तियां जलाकर आरती की जाती है। पांच बत्तियों से आरती करने को पंच प्रदीप आरती कहा जाता है। आरती ग्रहण के समय हथेली का स्पर्श सबसे पहले मस्तक पर करना चाहिए। इसके बाद आंख, नाक, कान, मुख, छाती और पेट पर स्पर्श करना चाहिए।

    डिसक्लेमर- इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।