समुद्र मंथन से प्रकट हुईं मां लक्ष्मी, फिर भगवान विष्णु से कैसे हुआ विवाह? पुराणों में छुपा है इसका गूढ़ रहस्य
पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता लक्ष्मी का प्राकट्य समुद्र मंथन से हुआ था, जहां वे 14 रत्नों में से एक ...और पढ़ें

मां लक्ष्मी ने क्यों चुना भगवान विष्णु को पति (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
माता लक्ष्मी का प्राकट्य समुद्र मंथन के दौरान हुआ।
उन्होंने स्वयंवर में भगवान विष्णु को पति चुना।
उनका विवाह सृष्टि संतुलन का प्रतीक माना जाता है।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में माता लक्ष्मी को धन, वैभव, सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य की देवी माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जिस स्थान पर भी माता लक्ष्मी का वास होता है वहां सुख-संपन्नता की कोई कमी नहीं रहती है।
क्या आप जानते हैं कि मां लक्ष्मी का प्राकट्य कैसे हुआ था और उनका विवाह भगवान विष्णु से किस प्रकार संपन्न हुआ? पौराणिक कथाओं में इस बात का वर्णन है कि समुद्र मंथन के दौरान 14 रत्नों में से एक माता लक्ष्मी थीं और उनके प्राकट्य के बाद उन्होंने पति के रूप में भगवान विष्णु को चुना था। वास्तव में यह एक रोचक प्रसंग है, आइए आपको बताते हैं इसमें छिपे कई रहस्यों के बारे में।
समुद्र मंथन से हुआ मां लक्ष्मी का प्राकट्य
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण देवराज इंद्र समेत सभी देवता अपनी शक्ति और वैभव खोने लगे थे। इसका लाभ उठाकर असुरों ने तीनों लोकों में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया। उससे परेशान होकर सभी देवता भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उनसे इस संकट का समाधान पूछा।
तब भगवान विष्णु ने देवताओं को असुरों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि समुद्र मंथन से अमृत प्राप्त होगा, जिसके सेवन से देवता फिर से शक्तिशाली हो जाएंगे। उसी समय देवताओं ने मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाकर समुद्र मंथन शुरू किया। उस दौरान अमृत कलश से पहले एक-एक करके 14 रत्न निकले जिनमें से एक माता लक्ष्मी भी थीं।
माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को पति रूप में क्यों चुना?
मां लक्ष्मी के प्रकट होते ही देवताओं, ऋषियों और असुरों के बीच उन्हें प्राप्त करने की इच्छा जागृत हुई। माता लक्ष्मी का स्वरूप इतना आकर्षक था कि सभी उनकी कृपा और साथ पाना चाहते थे। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां लक्ष्मी ने स्वयंवर के माध्यम से भगवान विष्णु को पति रूप में चुना और उन्हें वरमाला पहनाई। इसके बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का दिव्य विवाह संपन्न हुआ और मां लक्ष्मी भगवान विष्णु की अर्धांगिनी बनीं।
माता लक्ष्मी और विष्णु जी के विवाह का धार्मिक महत्व?
धार्मिक दृष्टि से मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु का मिलन केवल विवाह का प्रसंग नहीं था, बल्कि सृष्टि के संतुलन का प्रतीक भी माना जाता है। भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनहार कहा जाता है, जबकि मां लक्ष्मी धन, समृद्धि और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री हैं। माता लक्ष्मी धन और समृद्धि की देवी हैं।
उनका प्राकट्य अमावस्या के दिन हुआ था, भगवान विष्णु के साथ उनके विवाह के समय वर्ष की सबसे अंधेरी रात थी। उस दिन चारों ओर दीप जलाकर प्रकाश किया गया था। इसी कारण देवी लक्ष्मी का संबंध दीपावली से जुड़ गया और लोग धन-समृद्धि की प्राप्ति के लिए इस त्योहार पर लक्ष्मी पूजा करने लगे।
ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु के बिना मां लक्ष्मी की कृपा और मां लक्ष्मी के बिना भगवान विष्णु की लीला का संसार में पूर्ण स्वरूप प्रकट नहीं होता है।
इन्हों कारणों से धार्मिक अनुष्ठानों में भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी की पूजा होती है और उनका पूजन विष्णु ही की अर्धांगिनी की तरह होता है।
यह भी पढ़ें- हलाहल विष से लेकर अमृत कलश तक, समुद्र मंथन के 14 दिव्य रत्न जो बताते हैं धनतेरस का असली अर्थ
यह भी पढ़ें- समुद्र मंथन से जुड़ा है मां लक्ष्मी और कमल का नाता, यहां समझें देवी को क्यों चढ़ाते हैं यह फूल?
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।
देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।