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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 11, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

मुसलमान ईद अल अजहा के दिन मूल रूप से दो काम करते हैं

By Atul GuptaEdited By:
Published: Sun, 11 Sep 2016 09:49 PM (IST)Updated: Tue, 13 Sep 2016 09:55 AM (IST)

मुसलमान ईद अल अजहा के दिन मूल रूप से दो काम करते। पहले मस्जिद में ईद की सामुहिक नमाज और ...और पढ़ें

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ईद अल अजहा मुसलमानों का एक वार्षिक त्यौहार है जो की हिजरी महीने के आखिरी महीने ज़ुल हिज्ज में मनाया जाता है। दुनियाभर के मुसलमान इस महीने में मक्का ( सऊदी अरब) में एकत्रित होकर हज मनाते हैं।
ईद अल अजहा भी इसी दिन मनाई जाती है। वास्तव में ये हज की एक अंशीय अदायगी और मुसलमानों की एकता का दिन है। दुनिया भर के मुसलमानों का एक समूह मक्का में हज करता है और बाकी मुसलमान अपने अपने देशों में इस दिन ईद अल अजहा मनाते हैं लिहाजा यह दुनिया भर के मुसलमानों के लिए अंतरराष्ट्रीय एकता का दिन बन जाता है।

ईद अल अजहा का मतलब त्याग वाली ईद है। मुसलमान दुनिया भर में इस दिन जानवर की कुरबानी देते हैं पर यह एक प्रतीकात्मक क़ुरबानी है दरअसल जो असल क़ुरबानी है वह तो हर व्यक्ति को हर दिन देनी होती है।


यह जानना बहुत जरूरी है कि हज और उसके साथ जुडी हुई पद्धिति इब्राहीम और उनके परिवार द्वारा किये गए कार्यों को प्रतीकात्मक तौर पर दोहराने का नाम है। इब्राहीम के परिवार में उनकी बीवी थी जिनका नाम था हाजरा और दूसरे थे उनके बेटे इस्माईल।

हज का ऐतिहासिक परिपेक्ष्य यह है कि इब्राहीम ने एक स्वपन देखा था जिसमें वह अपने बेटे इस्माइल की कुरबानी दे रहे थे। इब्राहीम खुदा में अधिक विश्वास रखते थे जिस वजह से उन्होंने अपने इस स्वपन को सार्थक तौर पर लिया और वे अपने बेटे इस्माइल को खुदा की राह पे क़ुर्बान करने के लिए निकल पड़े जो की उस समय मात्र 10 वर्ष की आयु के थे।

किताबों में बताया जाता है कि खुदा ने अपने फरिश्तों को भेजकर इस्माइल की जगह एक जानवर की कुर्बानी करने को कहा लेकिन इब्राहिम से जो असल कुर्बानी मांगी गई थी वो खुद उसकी थी। दरअसल इब्राहिम ने अपने बेटे और उसकी मां को मक्का में बसाने का फैसला लिया और खुद मानव सेवा में लग गए। उस वक्त वहां एक विशाल रेगिस्तान के सिवाय कुछ भी नहीं था। इस तरह उनके परिवार के लिए रेगिस्तान में बसना इब्राहिम और उनके परिवार के लिए बड़ी कुर्बानी थी।


इब्राहिम के परिवार का ये विस्थापन इतिहास में नई व्यवस्था की शुरूआत थी। इस्माइल उसी रेगिस्तान में बड़े हुए और फिर एक बार रेगिस्तान से गुजर रहे एक काफिले में मौजूद एक युवती से इस्माइल की शादी हुई। यह एक नए वंश की शुरूआत थी जिसको इतिहास इश्माइलिट्स या बनु इस्माइल के नाम से जानता है। हजरत मोहम्मद साहब इसी वंश से पैदा हुए थे।

एक बहुत मशहूर कहावत है कि ‘हर बड़े काम की शुरूआत में औरत होती है’ यह कहावत यहां बिलकुल सच साबित होती है क्योंकि एक औरत और उसके बेटे ने सिर्फ एक वंश की बल्कि एक नए युग की स्थापना की।


मुसलमान ईद अल अजहा के दिन मूल रूप से दो काम करते हैं। पहले मस्जिद में ईद की सामुहिक नमाज और फिर कुर्बानी। नमाज आध्यात्मिकता सिखाती है और समर्पण कुर्बानी का जज्बा सिखाती है।


ईद अल अजहा तीन संदेश देता है। पहला संदेश ये कि परिवार के बड़े को अपने अपने निजी स्वार्थ से परे देखना चाहिए और अपने को मानव उत्थान के लिए लगाना चाहिए जिसकी मिसाल इब्राहीम बने। दूसरा त्याग के भाव को छोटी उम्र में ही बच्चे के मनन में अंतर्निविष्ट करना चाहिए ताकि वह आगे जाकर मानवता के लिए उपयोगी बने जो इस्माइल के जीवन में देखने को मिलता है। तीसरा संदेश औरत के लिए जो की इतिहास में एक नई स्वस्थ शुरुआत देने के लिए सदैव तत्पर रहें जिसका उदाहरण हाजरा बनी।

हर त्यौहार का एक इतिहास होता है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक उद्धरण बनता है जीवन जीने का। जैसे दीपावली का त्यौहार याद दिलाता है के हमेशा प्रकाश की अँधेरे पर जीत होती है। ऐसे ही ईद अल अज़हा भी याद दिलाता है के कैसे एक छोटे से परिवार ने मानवजाति के इतिहास में एक नया अध्याय लिखा।
ईद अल अज़हा बेशक एक दिन मनाई जाती है पर इसका असर पूरे साल रहना चाहिए। यह एक प्रखर मान्यताओं का पूर्वाभ्यास है।

(लेखक- रामिश सिद्दीकी)

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