उपासना का मतलब स्वयं को भगवान के प्रति समर्पित करना है
रामकृष्ण परमहंस कहते हैं कि जिस प्रकार मैले दर्पण में सूरज का प्रतिबिंब नहीं पड़ता उसी प्रकार मलिन अंत:करण में ईश्वर के प्रकाश का प्रतिबिंब नहीं पड़ सकता।
भगवान के करीब जाने की विधि उपासना है। जब हम किसी के करीब आते हैं तो स्वाभाविक रूप से उसके गुणों को हम आत्मसात करने लगते हैं। बुरे लोगों की संगत में बैठने से हममें भी कुछ न कुछ बुरी आदतें आ ही जाती हैं और अच्छी संगत के करीब जाने से हममें अच्छी आदतें आती हैं, इसलिए हर मनुष्य को भगवान की उपासना करनी चाहिए। भगवान की शरण में जाने भर से मनुष्य का कल्याण हो जाता है। भगवान के करीब आने से मनुष्य के विचारों में शुद्धता आ जाती है। ईश्वर के सानिध्य में आने पर निराश मनुष्य भी आशावादी बन जाता है, जबकि दीनहीन व्यक्ति खुद को मजबूत समझने लगता है। रामायण में लंका चढ़ाई के वक्त सेतु के निर्माण में रीछ-वानर बड़े-बड़े पत्थर उठाकर ले आए। आखिर रीछ-वानरों में अचानक इतनी शक्ति कहां से आ गई? उन्होंने स्वयं को श्रीराम के प्रति समर्पित कर दिया और इसी कारण वे इतने बलशाली हो गए।
उपासना का मतलब स्वयं को भगवान के प्रति समर्पित करना है। जब हमारे अंदर भगवान के प्रति समर्पण का भाव जाग्रत होता है, तो हमारे अहंकार का नाश होता है। तब हम अपने अहं से मुक्त होकर कण-कण में एक ही सत्ता के दर्शन करते हैं। एक मंदिर के प्रांगण में बैठे स्वामी विवेकानंद कुछ सोच रहे थे। मंदिर से एक व्यक्ति बाहर निकला और स्वामीजी को प्रणाम करते हुए उसने पूछा कि भगवान के दर्शन कैसे किए जा सकते हैं? स्वामीजी ने उससे कहा कि जब आप भीतर से भगवान के दर्शन करके आ रहे हैं, तब यह प्रश्न क्यों, क्या आपने भगवान को केवल पत्थर की मूर्ति समझकर निहारा था? कुछ क्षण रुकने के बाद स्वामीजी ने आगे कहा कि प्रत्येक व्यक्ति में भगवान विद्यमान हैं। यदि अंत:करण भूख से पीड़ित, कराहते हुए बीमार को देखकर द्रवित हो उठे तो समझना चाहिए कि आप परमात्मा की ओर बढ़ रहे हैं। यह विश्वास करना चाहिए कि जीवन और मृत्यु, सुख और दुख आदि में ईश्वर समान रूप से विद्यमान है। समस्त संसार ईश्वर का रूप है। ईश्वर पूजा आत्मा की ही उपासना है। रामकृष्ण परमहंस कहते हैं कि जिस प्रकार मैले दर्पण में सूरज का प्रतिबिंब नहीं पड़ता उसी प्रकार मलिन अंत:करण में ईश्वर के प्रकाश का प्रतिबिंब नहीं पड़ सकता।
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