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श्री मयूरेश्वर मंदिर: दूर से प्राचीन किला, अंदर विराजते हैं बप्पा! अष्टविनायक का पहला पड़ाव क्यों है इतना खास?

Published: Fri, 25 Sep 2026 09:55 AM (IST)

पुणे के मोरगांव में स्थित श्री मयूरेश्वर गणपति मंदिर अष्टविनायक यात्रा का पहला और आखिरी पड़ाव है। जानिए इस मंदिर का रहस्य, पौराणिक कथा।

यहीं से होती है महाराष्ट्र की 'अष्टविनायक यात्रा' की शुरुआत

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। जब हम किसी मंदिर में नंदी महाराज की विशाल मूर्ति देखते हैं, तो हमारा दिमाग सीधे भगवान शिव के दरबार की तरफ जाता है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि महाराष्ट्र में एक ऐसा अनोखा गणपति मंदिर है, जहां बप्पा के ठीक सामने नंदी विराजमान हैं? हम बात कर रहे हैं पुणे जिले के मोरगांव स्थित 'श्री मयूरेश्वर गणपति मंदिर' की।

यह वही पवित्र धाम है, जहां से महाराष्ट्र की प्रसिद्ध 'अष्टविनायक यात्रा' (आठ स्वयंभू गणेश मंदिरों की तीर्थ यात्रा) शुरू होती है और दर्शन के बाद यहीं आकर संपन्न भी मानी जाती है।

आखिर बप्पा कैसे बने 'मयूरेश्वर'?

यह तो हम सभी जानते हैं कि, भगवान गणेश का वाहन मूषक (चूहा) है। लेकिन, इस मंदिर में बप्पा का नाम मोर (मयूर) से जुड़ा है। इसके पीछे की पौराणिक कथा बेहद दिलचस्प है। मान्यताओं के अनुसार, त्रेता युग में सिंधुरासुर नाम के एक भयानक राक्षस ने स्वर्ग और पृथ्वी पर आतंक मचा रखा था। देवताओं को उसके अत्याचारों से बचाने के लिए गणपति ने माता पार्वती के अंश से एक नया अवतार लिया।

इस अवतार में भगवान की छह भुजाएं थीं और उन्होंने मूषक की जगह एक मोर को अपना वाहन चुना। इसी मोर पर सवार होकर बप्पा ने सिंधुरासुर की नाभि पर प्रहार किया और उसका वध कर दिया। मोर पर विराजने के कारण ही उन्हें 'मयूरेश्वर' या 'मोरेश्वर' की उपाधि मिली। कहते हैं कि अपना काम पूरा करने के बाद बप्पा ने वह मोर अपने छोटे भाई कार्तिकेय को सौंप दिया था। तभी कार्तिकेय जी का वाहन मोर है। गणेश पुराण और मुद्गल पुराण में इस पूरी घटना का बहुत ही सुंदर और प्रामाणिक वर्णन दर्ज है। 

किसी किले से कम नहीं है इस मंदिर की बनावट

पुणे से करीब 60-65 किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर की वास्तुकला आपको हैरान कर देगी। दूर से देखने पर यह किसी प्राचीन किले जैसा लगता है, जिसके चारों कोनों पर मीनारें हैं। मंदिर के चार दरवाजे हिंदू धर्म के चार युगों (सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग) का प्रतीक माने जाते हैं।

जैसे ही आप मुख्य द्वार से अंदर कदम रखते हैं, सबसे पहले 6 फीट ऊंचे चूहे की मूर्ति आपका स्वागत करती है। थोड़ा और आगे बढ़ने पर आपको वो रहस्यमयी नंदी दिखते हैं, जिनका मुख गणपति जी की ओर है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो आप जानेंगे कि यह मंदिर महान पेशवा शासकों की गहरी आस्था का केंद्र था, क्योंकि गणेश जी उनके कुलदेवता थे। संत मोरिया गोसावी के समय में इस मंदिर का काफी विकास हुआ।

कैसे पहुंचें और कब जाएं?

वैसे तो यहां साल के 365 दिन दर्शन होते हैं, लेकिन भाद्रपद की गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) और माघ महीने में यहां पैर रखने की जगह नहीं होती। पुणे से सड़क के रास्ते से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। अगर आप यहां दर्शन के लिए आ रहे हैं, तो पास ही मौजूद जेजुरी के 'खंडोबा मंदिर' और प्रकृति प्रेमियों के लिए 'मयूरेश्वर वन्यजीव अभयारण्य' जाना एक बेहतरीन अनुभव हो सकता है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।