केदार वैली में है 'मुंडकटिया गणपति' मंदिर, यहां होते हैं श्री गणेश के सबसे दुर्लभ स्वरूप के दर्शन
केदार घाटी में स्थित मुंडकटिया गणपति मंदिर भगवान गणेश के दुर्लभ स्वरूप के लिए प्रसिद्ध है, जहां उनकी प्रतिमा बिना सिर के स्थापित है।

रहस्यमयी मुंडकटिया गणपति मंदिर । (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यहां कई ऐसे प्राचीन और अनोखे मंदिर हैं, जिनसे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। ऐसा ही एक मंदिर केदार घाटी में है, 'मुंडकटिया गणपति मंदिर' है। इस मंदिर की सबसे खास बात यहां विराजमान भगवान गणेश का अनोखा स्वरूप है। यहां गणेश जी की प्रतिमा बिना सिर के स्थापित है। यही वजह है कि इस मंदिर को भगवान गणेश के दुर्लभ मंदिरों में से एक कहा जाता है।
कहां स्थित है मुंडकटिया गणपति मंदिर?
मुंडकटिया मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले की केदार घाटी में स्थित है। यह सोनप्रयाग से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर गौरी कुंड के रास्ते में पड़ता है। मंदिर में केदारनाथ जाने वाले पुराने पैदल मार्ग से भी पहुंंचा जा सकता है।
पहाड़ों और हरे-भरे जंगलों के बीच स्थित यह छोटा-सा मंदिर श्रद्धालुओं को बहुत आकर्षित करता है। मंदिर के नीचे बहती मंदाकिनी नदी और आसपास की पहाड़ियां इस स्थान और भी ज्यादा सुंदर बना देती हैं।
क्यों खास है यहां गणेश जी का स्वरूप?
मुंडकटिया गणपति मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां भगवान गणेश की बिना सिर वाली प्रतिमा के दर्शन होते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह वही स्थान है जहां भगवान शिव ने गणेश जी का सिर काट दिया था।
कहा जाता है कि बाद में भगवान शिव ने गणेश जी को हाथी का सिर प्रदान करके उन्हें पुनर्जीवन दिया था। इसी कथा से इस स्थान का संबंध भगवान गणेश के जीवन की महत्वपूर्ण घटना से जोड़ा जाता है।
कैसे पड़ा मुंडकटिया नाम?
'मुंडकटिया' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना माना जाता है। 'मुंड' का अर्थ सिर और 'कटिया' का अर्थ कटा हुआ बताया जाता है। इसी वजह से इस स्थान को मुंडकटिया कहा गया।
क्या है गणेश जी के सिर कटने की कथा?
धार्मिक कथा के अनुसार, एक बार माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं। उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक बालक का निर्माण किया और उसमें प्राण डाल दिए। यही बालक आगे चलकर भगवान गणेश कहलाए।
माता पार्वती ने गणेश जी को अपने द्वार पर पहरा देने के लिए कहा और किसी को भी अंदर आने से रोकने का आदेश दिया। उसी समय भगवान शिव वहां पहुंचे। गणेश जी ने माता के आदेश का पालन करते हुए भगवान शिव को अंदर जाने से रोक दिया।
इस बात पर भगवान शिव और गणेश जी के बीच विवाद हुआ। कथा के अनुसार, क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से गणेश जी का सिर अलग कर दिया। बाद में माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने गणेश जी को हाथी का सिर लगाकर पुनर्जीवन दिया।
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