Trending

    Move to Jagran APP
    pixelcheck
    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    जानें कैसे पड़ा विष्‍णु जी के इस मंदिर का नाम बद्रीनाथ

    By Molly SethEdited By:
    Updated: Thu, 25 Jan 2018 10:02 AM (IST)

    उत्‍तराखंड में अलकनंदा नदी के तट पर स्‍थित बद्रीनाथ मंदिर की कहानी बेहद रोचक है। आइये जाने इस मंदिर के बारे में कुछ महत्‍वपूर्ण बातें।

    जानें कैसे पड़ा विष्‍णु जी के इस मंदिर का नाम बद्रीनाथ

    ऐसा है बद्रीनाथ मंदिर

    बद्रीनाथ मंदिर, जिसे बद्रीनारायण मंदिर भी कहते हैं, अलकनंदा नदी के किनारे उत्तराखंड राज्य में स्थित है। यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बद्रीनाथ को समर्पित है। यह चार धाम में से एक धाम भी है। बद्रीनाथ मंदिर ऋषिकेश से 294 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर दिशा में स्थित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो यह 12 धाराओं में बंट गई। इस स्थान पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से प्रसिद्ध हुई और यहां पर बद्रीनाथ के रूप में भगवान विष्णु का निवास बना। भगवान विष्णु की प्रतिमा वाला वर्तमान मंदिर 3,133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और माना जाता है कि आठवीं शताब्दी के आदि शंकराचार्य ने इसका निर्माण कराया था। इसके पश्चिम में 27 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बद्रीनाथ शिखर कि ऊंचाई 7,138 मीटर है। मंदिर में एक विष्णु की वेदी है। यह 2,000 वर्ष से भी अधिक समय से एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान रहा है।
     
    जलती है अखंड ज्‍योति
    ये स्‍थान पंच-बदरी में से एक बद्री है। उत्तराखंड के पंच बदरी, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से तथा हिन्दू धर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इस मन्दिर में नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है और अखण्ड दीप जलता है, जो कि अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक है। यह भारत के चार धामों में प्रमुख तीर्थ-स्थल है। यहां पर ठंड के कारण अलकनन्दा में स्नान करना अत्यन्त ही कठिन है। अलकनन्दा के तो दर्शन ही किये जाते हैं और यात्री तप्तकुण्ड में स्नान करते हैं। यहां वनतुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है।
    मूर्ती स्‍थापना की कथा
    बद्रीनाथ की मूर्ति शालग्राम शिला से बनी हुई है और भगवान चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में हैं। कहा जाता है कि यह मूर्ति देवताओं ने नारदकुण्ड से निकालकर स्थापित की थी और सिद्ध, ऋषि, मुनि इसके प्रधान अर्चक थे। जब बौद्धों का प्रभाव बढ़ा हुआ तब उन्होंने इसे बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा आरम्भ की थी। कहते हैं कि शंकराचार्य की प्रचार-यात्रा के समय बौद्ध तिब्बत भागते हुए मूर्ति को अलकनन्दा में फेंक गए। तब शंकराचार्य ने इसे अलकनन्दा से बाहर निकालकर उसकी पुन: स्थापना की। ऐसा भी बताते हैं कि इसके बाद में मूर्ति एक बार फिर यहां से स्थानान्तरित हो गयी और तीसरी बार तप्तकुण्ड से निकालकर रामानुजाचार्य ने इसकी स्थापना की थी।
     
    बद्रीनाथ की रोचक कथा
    इस मंदिर की कहानी में कहा गया है कि जब भगवान विष्णु योगध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन थे तो बहुत अधिक हिमपात होने लगा। भगवान विष्णु हिम में पूरी तरह डूब चुके थे। उनकी इस दशा को देख कर माता लक्ष्मी का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने स्वयं भगवान विष्णु के समीप खड़े हो कर एक बेर (बदरी) के वृक्ष का रूप ले लिया और समस्त हिम को अपने ऊपर सहने लगीं। माता लक्ष्मी, भगवान विष्णु को धूप, वर्षा और हिम से बचाने की कठोर तपस्या में जुट गयीं। कई वर्षों बाद जब भगवान विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया तो देखा कि लक्ष्मीजी हिम से ढकी पड़ी हैं, तब उन्होंने माता लक्ष्मी के तप को देख कर कहा कि हे देवी! तुमने भी मेरे ही बराबर तप किया है, इसलिए आज से इस धाम पर मुझे तुम्हारे ही साथ पूजा जायेगा और क्योंकि तुमने मेरी रक्षा बदरी वृक्ष के रूप में की है सो आज से मुझे बद्री के नाथ-बद्रीनाथ के नाम से जाना जायेगा। इस तरह से भगवान विष्णु का नाम बद्रीनाथ पड़ा। जिस स्‍थान पर भगवान ने तप किया था, वही पवित्र-स्थल आज तप्त-कुण्ड के नाम से विख्यात है और उनके तप के रूप में आज भी उस कुण्ड में हर मौसम में गर्म पानी उपलब्ध रहता है।
     

    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें