जालंधर, जेएएनए। जालंधर की उपजाऊ धरती पर पक्के तौर पर बस जाना ही मुस्लिम कबीलों का मकसद हुआ करता था। उस दौर में बन्नु कोहार, पेशावर और अफगानिस्तान की सीमा से लगते क्षेत्रों से कई कबीले इस ओर आने लगे थे। बाबा मिट्ठू शाह जो मिट्ठू दरवेश के नाम से जाने जाते थे, उन्होंने भी एक खाली स्थान पर अपना बड़ा डेरा जमा लिया था। उनके पीछे उनके कई मुरीद भी अपने परिवारों सहित आकर रहने लगे। मिट्ठू शाह दरवेश एक सुन्नी मुस्लिम फकीर थे। मुगल बादशाह औरंगजेब ने जब सत्ता संभाली थी, उन्हीं दिनों इधर-उधर से कई कबीले मिट्ठू दरवेश के करीब आकर बस गए। एक अच्छी खासी बस्ती की स्थापना हो गई जो आस बस्ती मिट्ठू के नाम से जानी जाती है।

इस बस्ती की स्थापना के बारे में एक किवदंती यह सुनने में आती है कि इसका नाम मिट्ठू दरवेश नाम के एक चमत्कारिक तोते के कारण पड़ा। तोता इस्लामी संस्कृति और कुरान शरीफ की पवित्र वाणी भी बोलता था। वह बिस्मिल्लाह, अल्लाह मेहरबान के अतिरिक्त कलमा शरीफ भी बोल लेता था। यह बस्ती कपूरथला जाने वाली सड़क पर स्थित है, जो आज भी मौजूद है, परंतु मिट्ठू दरवेश के हुजरे और मजार के निशान अब नहीं मिलते और इसके लिए शोध कार्य की आवश्यकता है।


बलोचिस्तान से आकर फकीर इमदाद खान ने बसाई थी बस्ती पीरदाद

हिंदुस्तान को लूटने के लिए कई हमलावर यहां आते रहे, परंतु मुगल शासन के बाद विदेशी हमलावरों का आना थम गया। निर्धनता और अभाव से ग्रस्त मुस्लिम कबीले अपने पशुओं के लिए चरागाहों की तलाश में भटकते-भटकते त्रिगर्त प्रदेश की इस भूमि तक आते थे। इतिहासकार भी हैरान हैं कि सभी कबीलों के साथ एक मुस्लिम फकीर भी हुआ करता था। ऐसे ही एक पीरदाद नाम के फकीर थे, जिनका असली नाम इमदाद खान था। वह अपने कबीले के साथ यहां आए और यहीं बसने के लिए राजी कर लिया।

पीरदाद खान एक लंबा ऊंचे कद का बलोच था। वह बहुत सहज स्वभाव और मधुरवाणी का स्वामी था। अत: कई लोग इसके मुरीद हो गए। बस्ती पीरदाद की स्थापना भी मुगल शासन के समय में हुई मानी जाती है। कुछ इतिहासकार इस बस्ती को औरंगजेब के शासन से पहले की मानते हैं। पीरदाद की मजार अब कहीं नजर नही आई। हो सकता है कि समय उसे संभालकर न रख सका हो। आजकल यह बहुत घनी आबादी वाली बस्ती बन चुकी है। हैरानी की बात यह है कि इमदाद खां पहला बलोची था, जो अपने खानाबदोश कबीले के साथ हिंदुस्तान आया। प्रसिद्ध गायिका रेशमा भी ऐसे ही किसी बलोची खानाबदोश कबीले की सदस्य थीं। ये सब शाह अली कलंदर के मुरीद थे।
 

(प्रस्तुतिः दीपक जालंधरी - लेखक शहर की जानी-मानी शख्सियत और शहर के इतिहास के जानकार हैं)

 

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Posted By: Pankaj Dwivedi

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