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    गर्भपात के लिए महिला की इच्छा ही अंतिम, पति की अनुमति जरूरी नहीं; हाईकोर्ट का अहम फैसला

    Updated: Thu, 01 Jan 2026 07:32 PM (IST)

    पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि गर्भपात के लिए विवाहित महिला की इच्छा और सहमति ही सर्वोपरि है, पति की अनुमति आवश्यक नहीं ...और पढ़ें

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    गर्भपात के लिए महिला की इच्छा ही अंतिम- हाईकोर्ट

    दयानंद शर्मा, चंडीगढ़। महिलाओं की शारीरिक स्वायतता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संवैधानिक संरक्षण देते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

    अदालत ने कहा कि गर्भपात के लिए विवाहित महिला की अपनी इच्छा और सहमति ही सर्वोपरि है और इसके लिए पति की अनुमति न तो आवश्यक है और न ही कानून इसकी मांग करता है।

    हाई कोर्ट के जस्टिस सुवीर सहगल ने फतेहगढ़ साहिब की 21 वर्षीय महिला की याचिका को स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। महिला ने 16 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति मांगी थी।

    याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया था कि उसका विवाह 2 मई, 2025 को हुआ था, लेकिन विवाह के बाद ही वैवाहिक संबंध तनावपूर्ण हो गए। इस कारण वह लंबे समय से मानसिक तनाव और चिंता से गुजर रही हैं।

    ऐसे हालात में अनचाही गर्भावस्था ने उनकी मानसिक स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया। इसके बाद उन्होंने गर्भपात की अनुमति के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    हाई कोर्ट ने 22 दिसंबर को पीजीआइ चंडीगढ़ को निर्देश दिया कि वह एक मेडिकल बोर्ड गठित कर याचिकाकर्ता की जांच करे और यह रिपोर्ट दे कि गर्भपात चिकित्सकीय रूप से संभव और सुरक्षित है या नहीं। मेडिकल बोर्ड ने 23 दिसंबर 2025 को महिला की जांच की।

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    बोर्ड की रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि अल्ट्रासाउंड जांच के अनुसार याचिकाकर्ता की गर्भावस्था 16 सप्ताह और 1 दिन की है। गर्भ में एकल जीवित भ्रूण है और जन्मजात विकृति नहीं है। बोर्ड ने राय दी कि महिला चिकित्सकीय रूप से गर्भपात के लिए फिट है।

    इन तथ्यों के आधार पर कोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या गर्भपात के लिए पति की सहमति आवश्यक है। इस पर कोर्ट ने मेडिकल टर्मिनेशन आफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 की व्याख्या की और पूर्व में दिए गए कई निर्णयों का हवाला दिया।

    कोर्ट ने कहा कि कानून में कहीं भी पति की सहमति का कोई प्रविधान नहीं है। कोर्ट ने दोहराया कि विवाहित महिला ही यह तय करने की सर्वश्रेष्ठ निर्णायक है कि वह गर्भावस्था जारी रखना चाहती है या उसे समाप्त करना चाहती है।

    महिला की सहमति और इच्छा ही निर्णायक

    अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “महिला की सहमति और इच्छा ही निर्णायक है, इसके अतिरिक्त किसी अन्य अनुमति की आवश्यकता नहीं है”। हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता एक सप्ताह के भीतर पीजीआइ चंडीगढ़ या किसी अन्य अधिकृत अस्पताल से सुरक्षित तरीके से गर्भपात करवा सकती है।

    साथ ही अस्पताल को निर्देश दिए गए कि प्रक्रिया के दौरान सभी आवश्यक सावधानियां और चिकित्सकीय मानकों का पूरी तरह पालन किया जाए।