चंडीगढ़, जेएनएन। मुख्‍यमंत्री कैप्‍टन अमरिंदर सिंह से टकराव के बाद कैबिनेट मंत्री पद से इस्तीफा देने वाले नवजोत सिंह सिद्धू का सियासी करियर अधर में दिख रहा है। सिद्धू के लिए वर्तमान हालत में कांग्रेस छोड़ना आसान नहीं है। अगर वह कांग्रेस से अपनी राह अलग करते हैं तो उनके पास आगे की राजनीति के लिए विकल्प बेहद कम हैं। सिद्धू के लिए कांग्रस के अलावा कोई और राह अभी नहीं दिख रही है। वह भाजपा छोड़कर ही कांग्रेस में शामिल हुए थे। आम आदमी पार्टी का दरवाजा खुद उन्होंने अपने लिए बंद कर दिया था। वैसे यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि वह आम आदमी पार्टी से अलग हुए सुखपाल सिंह खैहरा और बैंस बंधुओं के साथ मिलकर मोर्चा बना सकते हैं। उन्‍होंने सिद्धू को अपने साथ आने का न्‍यौता भी दिया है।

मोदी के खिलाफ लगातार बोलने के कारण भाजपा में वापसी मुश्किल, आप से भी पहले टूट चुकी है बातचीत
राजनीति के जानकारों का कहना है तो सिद्धू लोकसभा चुनाव के दौरान लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोल रहे थे। ऐसी स्थिति में भाजपा में उनकी वापसी की संभावना न के बराबर है। कांग्रेस में आने से पहले आम आदमी पार्टी ने सिद्धू को पंजाब में अपना चेहरा बनाने से मना कर दिया था। इसके बाद कांग्रेस में शामिल होने के बाद सिद्धू ने आप और आप के राष्‍ट्रीय समन्‍वयक व‍ दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर हल्‍ला बोल दिया था। सिद्धू इसके बाद केजरीवाल पर लगातार हमले करते रहे। ऐसे में आम आदमी पार्टी का विकल्‍प भी उनके लिए कम ही दिखाई देता है, वैसे राजनी‍ति में कोई स्‍थायी दोस्‍त या दुश्‍मन नहीं होता।

राजनीति जानकारों का कहना है कि पूरे परिदृश्‍य में सिद्धू के समक्ष कांग्रेस में रह कर समीकरणों के बदलने का इंतजार करने के अलावा कोई और चारा नहीं दिख रहा है। यही कारण है कि सिद्धू ने केवल मंत्री पद से इस्तीफा दिया है, विधायक पद से नहीं। ऐसे में नवजोत सिद्धू के अगले कदम पर लाेगों की नजरें जम गई हैं।

नहीं तो बढ़ जाएगी मुसीबत
सिद्धू के खिलाफ जीरकपुर नगर काउंसिल में जांच हुई और विजिलेंस ने फाइलों को खंगाला है। विजिलेंस ने अमृतसर इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट की फाइलों को भी खंगाला है। निश्चित रूप से यह दोनों ही मामले सिद्धू के लिए परेशानी खड़ी कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में अगर सिद्धू कांग्रेस छोड़ते हैं तो उनकी परेशानी और बढ़ सकती है।

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एक चुप, सौ सुख
भाषा पर पकड़ और वाकपटुता ने सिद्धू को अर्श तक पहुंचाया। उसी वाणी ने सिद्धू को फर्श तक भी पहुंचा दिया है। वर्तमान स्थिति में सिद्धू की चुप्पी ही उनके लिए ऑक्सीजन का काम कर सकती है।

सिद्धू के पास पहले बड़ा विभाग था : चन्नी
उधर कैबिनेट मंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने कहा कि नवजोत सिंह सिद्धू को स्थानीय निकाय विभाग के जाने का अधिक दुख है। पहले उनके पास बड़ा विभाग था। बिजली विभाग भी बड़ा है, लेकिन वह उसको छोटा मान रहे हैं। सिद्धू को यह समझना चाहिए कि कोई विभाग  बड़ा-छोटा नहीं है। जनता ने पांच वर्ष काम करने की जो जिम्मेदारी दी है उसे निभाना चाहिए।

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सिद्धू कांग्रेस से इस्तीफा दें, हम सीएम बनाएंगे : बैैंस

लोक इंसाफ पार्टी के अध्यक्ष व लुधियाना से विधायक सिमरजीत सिंह बैंस ने कपूरथला में कहा कि कांग्रेस में रह कर सच बोलने वालों को जलील होना पड़ता है। सिद्धू ईमानदार नेता हैं। उन्हें मंत्री पद के साथ कांग्रेस से भी इस्तीफा देना चाहिए। वह हमारे साथ आकर पंजाब के हकों के लिए लड़ाई लड़ें। हम उन्हें पंजाब का मुख्यमंत्री बनाएंगे।

सिद्धू ने अमृतसर दफ्तर के स्टाफ को भेजा छुट्टी पर
उधर यहां सिद्धू की कोठी पर सन्नाटा पसरा गया है। उनके दफ्तर के स्टाफ को भी छुट्टी पर भेज दिया गया है। सूत्रों के मुताबिक रविवार को देर रात सिद्धू अमृतसर से दिल्ली या फिर चंडीगढ़ के लिए रवाना हो गए। उनके रवाना होने के बाद गाडिय़ों का काफिला कोठी से गायब था। डॉ. सिद्धू कोठी में ही थीं। कई बार मीडिया ने उन्हें संदेश भेजा और प्रतिक्रिया लेनी चाही, पर उन्होंने मिलने से इंकार कर दिया। इक्का-दुक्का समर्थक ही कोठी पर पहुंचे, पर उनसे भी परिवार का कोई सदस्य नहीं मिला।

मीडिया को रविवार को खबर मिली थी कि सिद्धू और उनकी पत्‍नी डॉ. सिद्धू होली सिटी स्थित अपनी कोठी में हैं। उनकी सिक्योरिटी की गाडिय़ों के अलावा उनकी गाडिय़ां भी कोठी में खड़ी थीं, पर कोठी के सारे गेट बंद करके रखे गए। दूसरे दिन सोमवार को भी यही आलम रहा।

हमेशा की दबाव की राजनीति
कैबिनेट मंत्री पद से इस्तीफा देने वाले सिद्धू ने हमेशा ही दबाव की राजनीति की है। चाहे भाजपा में रहते हुए 2016 में राज्यसभा से इस्तीफा देने का मामला हो या फिर 2014 में लोकसभा टिकट न मिलने की वजह से 'कोपभवन' में जाने का। 17 जुलाई 2009 में राजिंदर मोहन सिंह छीना को अमृतसर इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट का चेयरमैन बनाने के बाद भी वह अज्ञातवास पर चले गए थे।

2014 में जब उनकी टिकट काटकर उनके सियासी गुरु अरुण जेटली दे दी गई तब भी वह पूरी तरह से लोकसभा चुनाव से गायब हो गए। 2004 में गुरु नगरी की सियासी पिच पर राजनीति की पारी खेलने उतरे सिद्धू चाहे 2004, 2007, 2009 में भाजपा से सांसद बने, लेकिन उनकी वजह से पार्टी में बने गुटबंदी के हालात हाईकमान को खटकते रहे। सेलिब्रेटी होने के नाते 2004 से 2016 तक भाजपा ने तो सिद्धू को झेल लिया, पर 28 नवंबर 2016 को कांग्रेस ज्वाइन करने वाले सिद्धू को सवा दो सालों में ही संभालना कांगेस हाईकमान के लिए मुश्किल हो गया है।

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Posted By: Sunil Kumar Jha