चंडीगढ़, [कैलाश नाथ]। नवजाेत सिंह सिद्धू ने क्रिकेट की पिच पर स्पिन बॉलिंग पर खूब छक्‍के लगाए। दुनिया के तमाम दिग्‍गज बल्‍लेबाजों के लिए मुसीबत रहे महान स्पिन गेंदबाजों में से एक मुथैया मुरलीधरन की घूमती गेंदों को बाउंड्री के बाहर भेजने में उनको कभी दिक्कत नही आई, लेकिन राजनीति की फिरकी में 'गुरु' सिद्धू बुरी तरह फंस गए। राजनीति की फिरकी खेलने में नवजोत सिद्धू फिसड्डी साबित हो रहे हैं।

पहले मना किया अब कैप्टन को ही कप्तान मानने लगे गुरु

अपने जोशीले भाषण से लोगों में उत्साह का संचार कर देने वाले सिद्धू राजनीतिक गुणा-भाग में एक बार फिर विफल साबित हो रहे हैं। दो साल पहले जिस मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को उन्होंने कप्तान मानने से इंकार कर दिया था। अब वह उन्हें ही अपना कप्तान मानने को तैयार हैं।

राजनीतिक पिच पर भी लंबे-लंबे छक्के मारने की चाह में नवजोत सिंह सिद्धू अक्सर ही अपनी राजनीतिक पारी को छोटा कर बैठते हैं। चार बार सांसद रहे सिद्धू ने 2016 में भारतीय जनता पार्टी का साथ केवल इसलिए छोड़ दिया क्योंकि उन्हें भाजपा का शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन पसंद नहीं था। सिद्धू भाजपा पर लगातार गठबंधन तोड़ने को लेकर दबाव बनाते रहते थे, क्योंकि सिद्धू के सुखबीर बादल के साथ संबंध अच्छे नहीं थे।

उस समय भाजपा और अकाली दल का गठबंधन तो नहीं टूटा लेकिन सिद्धू ने पार्टी को छोड़ कर कांग्रेस का हाथ थाम लिया, जबकि भाजपा में रहते हुए सिद्धू ने चुनावी रैलियों में कांग्रेस को मुन्नी से भी ज्यादा बदनाम बताते थे। वह राहुल गांधी को 'पप्पू' और डा. मनमोहन सिंह को 'मौनी बाबा' का कह कर संबोधित करते थे। कांग्रेस को वह अक्‍सर 'गुडिया कांग्रेस' करार देते थे। सिद्धू जिस समय इस तरह के जोशीले भाषण देते थे, तब उन्होंने कभी इस बात की कल्पना नहीं की कि वह कभी कांग्रेस में भी जाएंगे। सिद्धू कांग्रेस में तो आ गए लेकिन अपने पीछे अपना शायद 'सुनहरा भविष्य' भी छोड़ कर आ गए।

भाजपा में सबसे बड़ा चेहरा बन सकते थे

सिद्धू ने जब भाजपा छोड़ी तक किसी ने कल्पना नहीं की थी कि भाजपा और अकाली दल का गठबंधन भी कभी टूट सकता है। लेकिन समय का पहिया घूमा और 2020 के तमाम उठापटक में यह गठबंधन भी टूट गया। गठबंधन टूटने के बाद भाजपा में सबसे बड़ी कमी सिख चेहरे को लेकर उभरी। ऐसे में यह भी चर्चा का विषय बनी कि अगर सिद्धू भाजपा में होते तो वह सबसे बड़ा चेहरा बन सकते थे।

पंजाब के कई राजनीतिक जानकारों का कहना है कि निश्चित रूप से वह आज भाजपा के मुख्यमंत्री पद का भी चेहरा हो सकते थे, लेकिन भाजपा में रहते हुए जो तीर उन्होंने कांग्रेस पर छोड़े थे, कांग्रेस में आने के बाद वही तीर भाजपा की तरफ चलाए। इससे उनकी भाजपा में वापस जाने की उम्मीद भी खासी क्षीण हो गई।

बड़ा सवाल- क्‍या जोश में खोया होश

2019 में जब मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नवजोत सिंह सिद्धू से स्थानीय निकाय विभाग वापस लेकर बिजली विभाग दे दिया तो इससे खफा होकर सिद्धू ने कैबिनेट मंत्री का पद छोड़ दिया। सिद्धू यहां पर भी चूक गए, क्योंकि बिजली एक मात्र ऐसा विभाग है जोकि पंजाब के हरेक घर से जुड़ा हुआ है। पंजाब में सबसे महंगी बिजली है और कांग्रेस ने सस्ती बिजली देने का वायदा किया था।

तीन निजी थर्मल प्लांटों से अकाली-भाजपा सरकार के दौरान किए गए समझौते के कारण राज्य पर 25 वर्षों में 65000 करोड़ रुपये का बोझ उपभोक्ताओं पर भी डाल रखा था। कांग्रेस के घोषणा पत्र में यह वायदा था कि उनकी सरकार बनने के बाद निजी थर्मल प्लांटों के साथ किए गए समझौते रद्द किए जाएंगे। सिद्धू अगर बिजली की दरों को कम करने में कामयाब रहे होते तो वह पंजाब के सबसे बड़े हीरो बन सकते थे। लेकिन, बिजली विभाग न लेकर उन्होंने एक सुनहरा मौका हाथ से जाने दिया। राजनीतिक विश्‍लेषकों का कहना है कि सिद्धू जोश में कई बार होश खो देते थे और ऐसा कुछ बोल  जाते थे जाे उन पर भारी पड़ जाता था।

अब कैप्‍टन की ही मर्जी पर चलेंगे

जानकारों का कहना है कि कांग्रेस सिद्धू को मनाने में लगी थह तरे सिद्धू भी पुनः पंजाब कैबिनेट में आने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भी सिद्धू के धैर्य की परीक्षा ले रहे थे। परिस्थिति को अपने अनुकूल पाकर कैप्टन ने सिद्धू को लंच पर आने का न्योता दिया। लंच के खत्म होने तक यह तय हो चुका था कि सिद्धू कैबिनेट में वापसी करेंगे लेकिन कैप्टन द्वारा दिए जाने वाले विभागों के साथ। यानी अब सिद्धू अपनी नहीं बल्कि कैप्टन की मर्जी पर मंत्री बनेंगे।

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