बठिंडा में करोड़ों खर्च के बावजूद सड़कों पर आवारा गौवंश का आतंक, लोग मांग रहे स्थायी समाधान
बठिंडा नगर निगम द्वारा करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद शहर में आवारा गौवंश की समस्या बनी हुई है। हर साल गौवंश को पकड़कर गौशालाओं में भेजा जाता है, ज ...और पढ़ें

करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद गौवंश की समस्या बरकरार, समाधान नदारद (फोटो: जागरण)
जागरण संवाददाता, बठिंडा। नगर निगम बठिंडा द्वारा हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद शहर में लावारिस गौवंश की समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। नगर निगम समय-समय पर शहर की सड़कों, गलियों, मोहल्लों और हाईवे पर घूम रहे गौवंश को पकड़कर अलग-अलग गौशालाओं में भेजता है। इस पूरी प्रक्रिया में गौवंश को पकड़ने, उनके परिवहन (ट्रांसपोर्टेशन) और डाइट मनी पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं।
नगर निगम बठिंडा को प्रतिवर्ष करीब 4 से 5 करोड़ रुपये काऊ-सेस के रूप में प्राप्त होते हैं। इसी काऊ-सेस की राशि से गौवंश को पकड़ने, गौशालाओं तक पहुंचाने और उनके भरण-पोषण पर खर्च किया जाता है। इसके बावजूद कुछ समय बाद फिर से शहर की सड़कों पर बड़ी संख्या में आवारा गौवंश दिखाई देने लगते हैं। इसके बाद नगर निगम दोबारा उसी प्रक्रिया में लग जाता है, जिससे यह सिलसिला लगातार चलता रहता है।
आरटीआई एक्टिविस्ट संजीव गोयल का कहना है कि जब तक बठिंडा के आसपास के बाहरी क्षेत्रों (आउटर एरिया) से शहर में प्रवेश करने वाले गौवंश पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जाती, तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। शहर में गौवंश पकड़ने के बावजूद बाहरी इलाकों से नए गौवंश लगातार बठिंडा में प्रवेश कर रहे हैं, जिससे समस्या जस की तस बनी हुई है।
वर्तमान में धुंध और घने कोहरे का मौसम चल रहा है। ऐसे मौसम में सड़कों और हाईवे पर बैठे या चलते गौवंश दिखाई नहीं देते, जिससे सड़क हादसों की आशंका और बढ़ जाती है। कई बार वाहन चालकों को अचानक सामने आए गौवंश के कारण दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है, जिससे जान-माल का नुकसान होने का खतरा बना रहता है। इस पूरे मामले को लेकर सूचना का अधिकार कानून-2005 के तहत 26 नवंबर 2025 को नगर निगम बठिंडा से जानकारी मांगी गई थी।
नगर निगम के पत्र नंबर 718 तारीख 26 दिसंबर 2025 के माध्यम से 29 दिसंबर 2025 को जानकारी उपलब्ध करवाई गई। यह सूचना नगर निगम के सैनिटेशन ऑफिसर-कम-लोक सूचना अधिकारी, हेल्थ शाखा द्वारा दी गई। आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार नगर निगम ने वर्ष 2020 से लेकर 17 दिसंबर 2025 तक करीब 6 वर्षों में कुल 10,101 गौवंश को पकड़कर विभिन्न गौशालाओं में भेजा है।
वर्षवार आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 में 2049, वर्ष 2021 में 1771, वर्ष 2022 में 1350, वर्ष 2023 में 2256, वर्ष 2024 में 1493 और वर्ष 2025 (17 दिसंबर तक) में 1182 गौवंश पकड़े गए। इन आंकड़ों के अनुसार सबसे अधिक गौवंश वर्ष 2023 में पकड़े गए, जबकि दूसरे स्थान पर वर्ष 2020 और तीसरे स्थान पर वर्ष 2021 रहा। हालांकि यह भी सामने आया है कि इन वर्षों में गौशालाओं में भेजे गए कई प्रतिशत गौवंश की अलग-अलग कारणों से मौत भी हो चुकी है।
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि केवल गौवंश को पकड़कर गौशालाओं में भेजना स्थायी समाधान नहीं है। इसके लिए बाहरी क्षेत्रों से आने वाले गौवंश पर रोक, गौशालाओं की क्षमता बढ़ाने और निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है। जब तक ठोस और दीर्घकालिक नीति नहीं बनाई जाती, तब तक करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद आवारा गौवंश की समस्या बनी रहेगी।

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