'पंजाब से अपनी जड़ों को कभी न टूटने दें सिख', UK में महाराजा दलीप सिंह की बरसी पर अकाल तख्त जत्थेदार का आह्वान
श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज ने यूके में महाराजा दलीप सिंह की बरसी पर सिखों ...और पढ़ें

हाराजा दलीप सिंह के स्मारक पर पहुंचे श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार कुलदीप सिंह गड़गज।
HighLights
जत्थेदार ने यूके में महाराजा दलीप सिंह की बरसी में शिरकत की।
सिखों से अपनी जड़ों और पंजाब से जुड़े रहने का आह्वान किया।
आपसी मतभेद भुलाकर कौम के बड़े हितों के लिए एकजुट होने पर जोर।
जागरण संवाददाता, अमृतसर। शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के पुत्र महाराजा दलीप सिंह की 133वीं बरसी को समर्पित समारोह में श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज ने शिरकत की। यूके के थैटफोर्ड में आयोजित इस समारोह के दौरान उन्होंने सिख समुदाय को अपनी जड़ों और पंजाब से जुड़े रहने, आपसी मतभेद भुलाकर कौम के बड़े हितों के लिए एकजुट होने तथा अपनी ऐतिहासिक विरासत को संभालने का आह्वान किया।
समारोह से पहले जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज ने सिख संगत के साथ थैटफोर्ड में स्थापित महाराजा दलीप सिंह के स्मारक पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि भेंट की। इसके बाद वह प्राचीन घर पहुंचे, जिसे महाराजा के पुत्र प्रिंस फ्रेडरिक दलीप सिंह ने वर्ष 1921 में थैटफोर्ड शहर को संग्रहालय के रूप में इस्तेमाल करने के लिए दिया था।
करीब 1490 में निर्मित इस ऐतिहासिक इमारत में महाराजा दलीप सिंह के अलावा उनके पांच पुत्रों और तीन बेटियों से जुड़ी ऐतिहासिक निशानियां भी रखी गई हैं। यूके में जन्मे सिख भूपिंदर सिंह बैंस (पीटर बैंस) ने महाराजा से जुड़े विभिन्न परिवारों से इन निशानियों को एकत्र कर सुरक्षित रखा है।
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विरासत को मजबूत बनाए रखने की जरूरत
इसके बाद जत्थेदार एल्वेडन पहुंचे, जहां महाराजा दलीप सिंह, उनकी पत्नी महारानी बंबा दलीप सिंह और सबसे छोटे पुत्र प्रिंस एडवर्ड अल्बर्ट दलीप सिंह की समाधियां स्थित हैं। समारोह में सिख नौजवान कविशरों के जत्थे ने महाराजा के जीवन और इतिहास से संबंधित कविताएं प्रस्तुत कीं। इस अवसर पर ल्यूटन काउंसिल के मेयर जावेद हुसैन सहित कई प्रमुख सिख हस्तियां और बड़ी संख्या में संगत मौजूद रही।
जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज ने कहा कि महाराजा दलीप सिंह का जीवन सिख कौम और पंजाब के प्रति प्रेम की प्रेरणा देता है। वह वर्ष 1893 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में अकाल चलाना कर गए थे। उनका दोबारा सिखी से जुड़ना और अपनी जड़ों की ओर लौटना आज की पीढ़ी के लिए बड़ा संदेश है।
उन्होंने कहा कि महारानी जिंद कौर ने कठिन परिस्थितियों में भी अपने पुत्र को सिखी से दोबारा जोड़ने का प्रयास किया। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर अपनी धार्मिक परंपराओं और पंजाब की विरासत को मजबूत बनाए रखने की जरूरत है।
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पंजाब में जमीनें बेचने के रुझान पर चिंता
उन्होंने कहा कि कुछ शरारती और सिख विरोधी लेखकों ने महाराजा रणजीत सिंह की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया है, लेकिन उनके शासन की न्यायप्रियता, समानता और आदर्श व्यवस्था को भुलाया नहीं जा सकता। पंथक लेखकों और विद्वानों को महाराजा रणजीत सिंह तथा महाराजा दलीप सिंह के इतिहास से जुड़े सच्चे तथ्यों और सिख दृष्टिकोण को विश्व स्तर पर सामने लाने के लिए विशेष प्रयास करने चाहिए।
जत्थेदार ने विदेश में बसने के लिए पंजाब में अपनी जमीनें बेचने के बढ़ते रुझान पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि रोजगार और मेहनत मजदूरी के लिए दुनिया के किसी भी हिस्से में जाना गलत नहीं है, लेकिन अपनी जन्मभूमि और विरासत से रिश्ता कभी नहीं तोड़ना चाहिए। पंजाब गुरु साहिबान की धरती है, जहां से गुरमत का दर्शन पूरी दुनिया में फैला है। उन्होंने उम्मीद जताई कि विदेशों में रह रहे सिख नौजवान भी अपनी धार्मिक जड़ों से दोबारा जुड़ेंगे।
कौमी मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत
उन्होंने कहा कि सिख समाज को छोटी-छोटी बातों पर आपसी झगड़ों में उलझने के बजाय बड़े कौमी मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। आपसी मतभेद भुलाकर गुरु साहिबान के सिद्धांतों और पंथ के हितों के लिए एकजुट होकर काम करने की जरूरत है। उन्होंने थैटफोर्ड में महाराजा दलीप सिंह के स्मारक और उसके आसपास के क्षेत्र की बेहतर देखभाल करने की आवश्यकता जताते हुए यूके की सिख संस्थाओं से इस दिशा में साझा प्रयास करने की अपील की।
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