Women Reservation Bill: 27 वर्षों से संसद में क्यों अटका है महिला आरक्षण विधेयक? जानिए इसके लिए कब-कब उठी आवाज
Women Reservation Bill संसद के पांच दिवसीय विशेष सत्र का सोमवार से आगाज हो गया है। संसद के पहले दिन की कार्यवाही पुराने संसद भवन से चली। इस दौरान पीएम मोदी ने सदन को संबोधित किया। जबकि विपक्षी दलों ने भी सरकार के सामने कई मुद्दे रखे। इनमें से एक मुद्दा महिला आरक्षण विधेयक से जुड़ा था। आएये जानते हैं इस विधेयक से जुड़ी बातें।

नई दिल्ली, ऑनलाइन डेस्क। Women Reservation Bill: संसद के पांच दिवसीय विशेष सत्र का सोमवार से आगाज हो गया है। संसद के पहले दिन की कार्यवाही पुराने संसद भवन से चली। इस दौरान पीएम मोदी ने सदन को संबोधित किया। जबकि विपक्षी दलों ने भी सरकार के सामने कई मुद्दे रखे। इनमें से एक मुद्दा महिला आरक्षण विधेयक से जुड़ा था।
सर्वदलीय बैठक में उठा महिला आरक्षण विधेयक का मुद्दा
दरअसल, महिला आरक्षण विधेयक पिछले 27 सालों से संसद में लंबित है। इस विधेयक को राजनीतिक दलों द्वारा मजूरी दिए जाने की मांग उठती रही है। हालांकि, इस बार जब केंद्र सरकार द्वारा संसद के विशेष सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाई गई तो कई दलों ने महिला आरक्षण विधेयक को मंजूरी दिए जाने की मांग की, लेकिन इस बैठक में सरकार की ओर से विधेयक को लेकर ज्यादा कुछ नहीं कहा गया।
क्या है महिला आरक्षण विधेयक?
भारत की आजादी में जितना योगदान पुरूषों का रहा है। उतना ही योगदान महिलाओं का भी रहा है। हालांकि, पुरूष नेताओं की संख्या विधानसभा से लेकर संसद तक में ज्यादा रही, लेकिन महिला नेताओं की संख्या नाम-मात्र ही रही। इसलिए महिला आरक्षण विधेयक को मंजूरी दिए जाने की मांग कई बार उठी, लेकिन इसे सफलता नहीं मिल पाई। बता दें कि महिला आरक्षण विधेयक में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षित करने का प्रावधान है। इसकी समयसीमा 15 वर्ष है।
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कब से लंबित है विधेयक?
- बता दें कि साल 1996 में पहली बार महिला आरक्षण विधेयक को संसद में पेश किया गया था। साल 1996 में एचडी देवगौड़ा की सरकार थी।
- हालांकि, इस विधेयक को गीता मुखर्जी की अध्यक्षता में गठित की गई संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया था।
- बाद में एचडी देवगौड़ा की सरकार गिरने से ये बिल लटक गया है।
- इसके बाद साल 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने इस बिल को दोबारा संसद में पेश किया, लेकिन इस बार भी इस विधेयक को लेकर राजनीतिक दलों में मतभेद नजर आए और इसे मंजूरी नहीं मिल पाई।
- महिला आरक्षण विधेयक को साल 1999 में फिर से लोकसभा में पेश किया गया, लेकिन ये कोशिश भी नाकाम रही।
- इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने साल 2003 में फिर से इसे पास कराना चाहा। मगर हर बार की तरह ये बिल लटका ही रह गया।
सरकार बदली लेकिन नहीं मिली मंजूरी...
साल 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी। इस दौरान कांग्रेस ने इस विधेयक को मंजूरी दिलाने का प्रयास किया। साल 2008 में यूपीए की सरकार ने इस बिल को राज्यसभा में पेश किया गया। इसके बाद इस बिल को स्टैंडिंग कमेटी को भेज दिया गया। हालांकि, साल 2010 में बिल राज्यसभा में पारित हो गया, लेकिन लोकसभा में ये बिल लटक गया। जिसके बाद से ही इस महिला को मंजूरी दिलाए जाने की मांग उठती रही है।
क्यों है इस बिल की जरूरत?
ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट-2022 में भारत में महिला नेताओं की स्थिति से अवगत कराया गया है। महिला मंत्री और सांसदों की संख्या के मामले में भारत की रैंकिंग 146 देशों में से 48वें स्थान पर है। जबकि इस मामले आइसलैंड और बांग्लादेश जैसे देशों की स्थिति काफी बेहतर है।
17वीं लोकसभा में क्या है महिलाओं की स्थिति?
बता दें कि 17वीं लोकसभा 14 फीसद महिलाएं ही सांसद हैं। लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 78 है। जबकि राज्यसभा में 11 फीसद महिलाएं प्रतिनिधित्व करती हैं। हालांकि, पहली लोकसभा के बाद से महिला सांसदों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी ही दर्ज की गई है। पहली लोकसभा में यह संख्या पांच फीसद थी।
इन दलों ने महिलाओं के लिए आरक्षित की सीटें
बताते चलें कि महिलाओं के लिए कई दलों ने सीटें आरक्षित की है। इनमें बीजू जनता दल और तृणमूल कांग्रेस शामिल हैं। इसके अलावा महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और केरल सहित कई राज्यों के स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया है।
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