महाराष्ट्र [जागरण स्पेशल]। हाल में हुए हरियाणा व महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों का परिणाम आए पांच दिन बीत चुके हैं। बावजूद महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर रस्साकसी जारी है। शिवसेना के रुख ने राज्य में सरकार गठन के लिए भाजपा की मुश्किलें बढ़ा दी है। इससे महाराष्ट्र का राजनीतिक रण दिलचस्प हो चुका है। महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं जारी हैं। आइये जानते हैं- महाराष्ट्र में सरकार गठन का क्या हो सकता है फार्मूला?

भाजपा-शिवसेना: 50-50 का फार्मूला बना कांटा

महाराष्ट्र में भाजपा की पुरानी साथी शिवसेना ने चुनाव परिणाम आते ही अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए थे। दोनों दलों की मिलाकर कुल 161 सीटें हो रही हैं, जो बहुमत के आंकड़े से 16 ज्यादा है। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने मतगणना के दिन ही सरकार गठन के लिए 50-50 का फार्मूला रख दिया था। मतलब, राज्य में ढाई-ढाई वर्ष दोनों दलों का मुख्यमंत्री होगा। भाजपा फिलहाल इसके लिए तैयार नहीं है और शिवसेना 50-50 के लिखित आश्वासन पर अड़ी हुई है। शिवसेना का दावा है कि चुनाव पूर्व ही ये फार्मूला तय हो गया था। वहीं मंगलवार को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस दावे को खारिज कर दिया। साथ ही फडणवीस ने दावा किया कि अगले पांच साल राज्य की भाजपा नेतृत्व वाली सरकार में वही मुख्यमंत्री बने रहेंगे। मंगलवार को पुराने सहयोगियों के बीच विवाद तब और बढ़ गया, जब शिवसेना के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने कहा कि उनकी पार्टी सत्य की राजनीति करती है। वह सत्ता की भूखी नहीं है।

शिवसेना+एनसीपी+कांग्रेस: मुश्किल है ये जोड़

सरकार गठन के लिए शिवसेना, भाजपा पर दबाव बनाने का हर संभव प्रयास कर रही है। यही वजह है कि मंगलवार को शिवसेना नेता संजय राउत ने संगठन के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के हवाले से कहा कि हमारे पास अन्य विकल्प मौजूद हैं। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि हम (शिवसेना) उन विकल्पों को स्वीकारने का पाप नहीं करना चाहती। अन्य विकल्प को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं कि शिवसेना का इशारा, एनसीपी और कांग्रेस के साथ सरकार बनाने का है। तीनों दलों की मिलकर राज्य में कुल 154 सीटें हो रही हैं, जो बहुमत के आंकड़े से 9 सीट ज्यादा है। हालांकि, जानकार इस फार्मूले को सबसे कमजोर मानते हैं। जानकारों के अनुसार भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए कांग्रेस इस फार्मूले पर तैयार हो सकती है, लेकिन एनसीपी चीफ शरद पवार का तैयार होना बहुत मुश्किल है। वह भी ऐसी स्थिति में जब शिवसेना सीधे मुख्यमंत्री पद की मांग कर रही है।

भाजपा-एनसीपीः क्या होंगी शर्ते?

महाराष्ट्र में सरकार गठन का एक और फार्मूला ये हो सकता है कि भाजपा, शरद पवार को इसके लिए तैयार कर ले। भाजपा और एनसीपी की मिलाकर राज्य में कुल 159 सीटें होंगी, जो बहुमत के आंकड़े से 14 ज्यादा होगी। यहां सवाल उठता है कि चुनाव में एक-दूसरे पर जमकर हमला बोलने वाली एनसीपी व भाजपा क्यों और किन शर्तों पर साथ आ सकते हैं? जानकार मानते हैं कि एनसीपी को भाजपा के साथ गठबंधन से ज्यादा गुरेज नहीं होगा। इसकी वजह एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार और पार्टी नेता प्रफुल्ल पटेल के खिलाफ चल रही ईडी जांच है। विधानसभा चुनाव पूर्व ही ईडी ने शरद पवार के खिलाफ को-ऑपरेटिव बैंक घोटाले से जुड़े मामले में केस दर्ज किया है। वहीं एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल का नाम अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के गुर्गे इकबाल मिर्ची संग जमीन सौदे को लेकर जुड़ रहा है। ऐसे में एनसीपी जांच में राहत की उम्मीद के भरोसे भाजपा को समर्थन देने को तैयार हो सकती है। इस तरह से भाजपा राज्य में उसके लिए बार-बार मुसीबत बनने वाली शिवसेना को भी सबक सिखा सकती है।

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भाजपा-शिवसेना गठबंधन का फार्मूला ये भी

भाजपा, अगर एनसीपी के साथ मिलकर राज्य में सरकार बनाने में कामयाब हो जाती है तो ये शिवसेना के लिए बड़ा झटका साबित होगा। शिवसेना भी ये बात अच्छे से समझ रही है। इन सबके बीच भाजपा-शिवसेना गठबंधन का फार्मूला ये भी सामने आया है। भाजपा ने शिवसेना के 50-50 फार्मूले को नकारते हुए जो नया फार्मूला दिया है। इसमें आदित्य ठाकरे को डिप्टी सीएम बनाने का प्रस्ताव शामिल है। माना जा रहा है कि शिवसेना इस फार्मूले पर काफी हद तक तैयार है, लेकिन वह पार्टी हाईकमान से इस पर ठोस आश्वासन चाहती है। फिलहाल महाराष्ट्र में सरकार गठन का ये फार्मूला सबसे मजबूत माना जा रहा है।

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कई बार भाजपा के लिए मुसीबत बनी शिवसेना

शिवसेना अब तक कुल तीन बार भाजपा के साथ महाराष्ट्र में गठबंधन की सरकार बना चुकी है। दोनों पार्टियों की विचारधारा काफी मिलती-जुलती है। बावजूद सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका या मलाईदार मंत्रालय के बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच पहले भी कई बार खींचतान सार्वजनिक हो चुकी है। 2014 विधानसभा चुनाव के बाद भी दोनों दलों के बीच ऐसी खींचतान देखने को मिली थी। तीनों बार सरकार गठने के लिए शिवसेना ने भाजपा पर खूब दबाव बनाया। शिवसेना का अड़ियल रुख उसका पुराना पैतरा है, जो ज्यादातर कामयाब भी रहा है। यही वजह है कि इस बार भी शिवसेना अपने इस पुराने तरीके से ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने के प्रयास में है। शिवसेना को भी अच्छे से पता है कि वह केवल एनसीपी के साथ मिलकर सरकार नहीं बना सकती। इसके लिए उसे कांग्रेस के साथ की जरूरत पड़ेगी। राजनीति की पिच पर कांग्रेस संग साझेदारी, शिवसेना को काफी भारी पड़ सकती है।

Posted By: Amit Singh

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