जानें, हाइप्रोफाइल मामलों में अक्सर सीबीआइ क्यों हो जाती है नाकाम
2जी मामले में फैसला सुनाते हुए जज ओ पी सैनी ने कहा कि सीबीआइ आरोपियों के खिलाफ पुख्ता साक्ष्य पेश करने में नाकाम रही। ...और पढ़ें

नई दिल्ली [स्पेशल डेस्क]। देश के सबसे बड़े घोटाले में से एक 2 जी स्पेक्ट्रम केस में फैसला अब देश के सामने है। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट की विशेष अदालत के जज ओ पी सैनी पर सबकी निगाह टिकी थी। खास लोग हों या आम लोग सभी ये जानना चाहते थे कि एक लाख 76 हजार करोड़ के घोटाले में जज साहब आरोपियों के लिए राहत बन कर आएंगे या आफत। 10.30 बजे नियत समय पर आने वाले फैसले में थोड़ी देरी हुई। जज साहब ने फैसला सुनाना शुरू किया और आरोपियों के चेहरे पर मुस्कान बिखरने लगी। करीब 15 मिनट में जज ओ पी सैनी ने ए राजा समेत 17 आरोपियों को तीनों मामले में बरी कर दिया। लेकिन इसके साथ ही देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी यानि सीबीआइ के चेहरे पर मायूसी थी।
जज साहब ने अपने अंदाज में जांच एजेंसी के बारे में बहुत कुछ कह दिया। सीबीआइ के अधिकारी और वकील जज ओ पी सैनी की टिप्पणियों को सुनते रहे। उनके पास जज साहब के सामने कुछ कहने के लिए बचा नहीं था। ये बात अलग है कि पटियाला हाउस कोर्ट से बाहर आने के बाद उन्होंने कहा कि वो हाइकोर्ट में अपील करेंगे। लेकिन ये पहला मौका नहीं है जब स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच एजेंसी को इस तरह की टिप्पणियों का सामना करना पड़ा हो। 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 2जी स्पेक्ट्रम को मनमाने ढंग से आवंटित किया गया था और इसके साथ ही सभी 122 आवंटन को रद्द कर दिया था।
सीबीआइ को जब सौंपी जाती है जांच
आर्थिक अपराध हों या फौजदारी के मामले जब उसे राज्य पुलिस पर्दाफाश करने में नाकाम साबित होती है तो उस हालात में जनदबाव या किसी और वजह से उन मामलों को सीबीआइ को रेफर किया जाता है। दरअसल पीड़ित पक्ष को यकीन होता है कि सीबीआइ आधुनिक तरीके से केस की तहकीकात कर सच लाएगी। ऐसा देखा भी गया है कि सामान्य मामलों में मसलन जिसकी प्रोफाइल थोड़ी सी कम हो उसमें जांच एजेंसी बेहतर काम करती है। लेकिन हाइ प्रोफाइल मामलों में सीबीआइ को अदालत की कड़ी फटकार का सामना भी करना पड़ा है।
.jpg)
2जी केस और सीबीआइ
2 जी स्पेक्ट्रम मामले में जब जज साहब ने फैसला सुनाना शुरू किया तो उनकी तरफ से सीबीआइ के लिए तल्ख टिप्पणी आई। उन्होंने कहा कि केंद्रीय जांच एजेंसी ने पुख्ता साक्ष्यों को पेश नहीं किया जिसकी वजह से आरोपियों को दोषी ठहराने का आधार नहीं है। अदालत के इस फैसले के बाद जमकर राजनीति भी शुरू हो गई। पूर्व टेलिकॉम मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि वो जिस जीरो लॉस की बात करते थे वो अब सही है। अब मौका आ चुका है कि जब गलत जांच के लिए जिम्मेदार एजेंसियों को आरोपी बनाकर उनके खिलाफ मामला बनाया जाना चाहिए। इसके साथ ही राज्यसभा में कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि जिस घोटाले से एक सरकार चली गई वो घोटाला हुआ ही नहीं था। यही नहीं पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने कहा कि उनके खिलाफ दुष्प्रचार हुया। लेकिन नेताओं के इन बयानों से इतना तो साफ है कि हाइप्रोफाइल मामलों में कहीं न कहीं जांच एजेंसियां प्रभावित हो जाती है।
आरुषि-हेमराज केस
इसके साथ ही सीबीआइ जांच से जुड़े मामलों में जब अदालत फैसला करती है को आरुषि-हेमराज मर्डर मामला बरबस याद आता है। आप को याद होगा कि आरुषि हत्याकांड की जांच पहले यूपी पुलिस के हवाले थी। लेकिन पीड़ित पक्ष के ऐतराज के बाद ये मामला सीबीआइ को सौंपा गया। सीबीआइ ने जांच की और विरोधाभाषी रिपोर्ट सामने आई। एक जांच में जहां तलवार दंपति को क्लीन चिट देकर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की गई। लेकिन गाजियाबाद की सीबीआइ अदालत ने क्लोजर रिपोर्ट का चार्जशीट मानकर मुकदमा चलाने का निर्देश दिया। निचली अदालत से राजेश तलवार और नुपूर तलवार को सजा हुई। लेकिन इलाहाबाद हाइकोर्ट ने तलवार दंपति को रिहा करते हुए कहा कि कपोलकल्पित जांच और निष्कर्ष से किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। और इस तरह से तलावर दंपति बेदाग बाहर निकले।
.gif)
पिंजड़े में बंद सरकारी तोता है सीबीआइ
सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआइ पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि सरकारी अफसरों ने कोयला घोटाले की जांच रिपोर्ट की आत्मा बदल दी। यही नहीं अदालत ने सीबीआई को पिंजड़े में बंद सरकारी तोता करार दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारी अफसरों की सलाह पर घोटाले की स्टेट्स रिपोर्ट की आत्मा बदल दी गई। ये कैसे मान लिया जाए कि कोयला घोटाले की जांच निष्पक्ष होगी। सीबीआई पिंजड़े में बंद तोते की तरह है जो मालिक की बोली बोलता है। वो ऐसा तोता है जिसके कई मालिक हैं। कैसे मुमकिन है कि दो संयुक्त सचिवों की मौजूदगी में स्टेट्स रिपोर्ट देखी जा रही थी ? सीबीआई क्या कर रही थी वो जांचकर्ता है या फिर इस केस में उसकी मिलीभगत है? सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को फटकार लगाते हुए कहा कि ध्यान रहे आगे से सीबीआई किसी को भी, न कानून मंत्री को, न किसी दूसरे केंद्रीय मंत्री को कोयला घोटाले की जांच की भनक तक न लगने दे।

कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।