प्रदीप सिंह, रांची। बिहार से अलग हुए झारखंड को बस दो ही साल हुए थे। नवोदित राज्य की पहली सरकार अंदरूनी कारणों से डगमगा रही थी। लगातार बैठकों का दौर और इसी क्रम में एक कम चर्चित नाम मुख्यमंत्री के तौर पर उभरा। वे थे अर्जुन मुंडा। राजनीतिक पंडितों ने इस फैसले को शक की नजर से देखा लेकिन देश के सबसे कम उम्र में मुख्यमंत्री का ताज पहनने वाले अर्जुन मुंडा ने तब हिंसा की आग में जलते झारखंड को बाहर निकाला था। पूरा प्रदेश उस वक्त बाहरी-भीतरी के नाम पर हिंसा की चपेट में था। प्रशासनिक कौशल का परिचय देते हुए अलग-अलग कालखंड में अर्जुन मुंडा ने तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। इस दौरान कई बार डगमगाए और संभले लेकिन कभी हिम्मत नहीं हारी। हमेशा अर्जुन की तरह लक्ष्य पर नजर बनाए रखी।

2014 में पारंपरिक क्षेत्र खरसावां से विधानसभा का चुनाव हार गए तो राजनीतिक विरोधियों ने कई तरह के कयास लगाए, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में खूंटी (सुरक्षित) से विजय पताका लहराकर अर्जुन मुंडा ने जनजातीय मामलों के केंद्रीय मंत्री का पद संभाला। हमेशा विपरीत परिस्थितियों से जूझकर बाहर निकलने वाले अर्जुन मुंडा का जीवन अर्जुन से कम संघर्षपूर्ण नहीं रहा। औसत परिवार और कोई राजनीतिक बैकग्राउंड नहीं। कम उम्र में ही पिता का साया सिर से उठ गया। पढ़ाई सरकारी स्कूल से हुई। पढ़ाई करते हुए राजनीति की शुरुआत झारखंड मुक्ति मोर्चा से की। खरसावां से चुनकर विधानसभा में पहुंचे। लेकिन राजनीति में एक के बाद एक सीढियां चढ़ते गए। सरकार से लेकर संगठन तक का विस्तृत अनुभव हासिल किया। कम ही लोगों को पता होगा कि अर्जुन मुंडा बहुभाषी हैं। हिंदी और अंग्रेजी पर बेहतर पकड़ होने के साथ-साथ वे कई क्षेत्रीय भाषाओं की भी जानकारी रखते हैं। तभी तो भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर उन्हें जब असम की जिम्मेदारी दी गई तो वह असमिया में प्रचार करते और जब पश्चिम बंगाल पहुंचे तो बांग्ला में ममता बनर्जी सरकार को घेरते दिखे। संबंधों को सम्मान देना उनकी खासियत हैं और जिस आत्मीयता और गर्मजोशी से वे लोगों से मिलते हैं, लोग उनके मुरीद हो जाते हैं। चेहरे पर शिकन कभी नहीं आने देते।

अर्जुन मुंडा की प्रतिभा को काफी कम उम्र में महसूस किया भालूबासा हरिजन हाई स्कूल, जमशेदपुर के गणित के शिक्षक केदारनाथ मिश्रा ने। मुंडा इस स्कूल के विद्यार्थी रहे हैं। यह भी महज एक संयोग है कि झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी इसी स्कूल से शिक्षा ग्रहण की है। शिक्षक केदारनाथ मिश्रा अपनी स्मृतियां साझा करते हुए बताते हैं कि अर्जुन मुंडा काफी गंभीर विद्यार्थी थे। वे सामाजिक विषयों पर भी गंभीर चर्चा में हिस्सा लेते थे। नेतृत्व का गुण उनके भीतर था। कभी कोई सवाल पूछने में हिचकते नहीं थे और साथियों की मदद को भी तत्पर रहते थे।

गोल्फ के हैं शौकीन
अर्जुन मुंडा कहीं भी रहें, गोल्फ का एक सेट उनकी गाड़ी में मौजूद रहता है। शौकिया तौर पर उन्होंने इसकी शुरुआत की थी और अब वे इस खेल में माहिर हो चुके हैं। जमशेदपुर और रांची के गोल्फ ग्राउंड में वे अक्सर दिख जाते हैं। तीरंदाजी के प्रति भी उनके मन में गहरा आकर्षण है। उन्होंने एक अकादमी भी बना रखी है जिसमें उभरते हुए तीरंदाजों को प्रशिक्षण दिया जाता है। हाल ही में वे भारतीय तीरंदाजी संघ के निर्विरोध अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए हैं।


विपक्षी दलों से भी मधुर संबंध
अर्जुन मुंडा की एक और खासियत में शुमार है विपक्षी दलों के नेताओं संग बेहतर संपर्क। इसी के बलबूते पर उन्होंने बार-बार झारखंड की कमान संभाली। बहुमत में नहीं रहने के बावजूद वे सरकार के लिए आवश्यक बहुमत जुटा पाए। हालांकि सरकार चलाने के लिए एक हद से ज्यादा समझौते भी नहीं किए। कई बार दबाव पड़ने के बावजूद उन्होंने जल्दबाजी में फैसले लेने से परहेज किया। विपक्षी दलों के नेताओं संग उनके आत्मीय संबंध का ही असर है कि उन्होंने धुर विरोधी झारखंड मुक्ति मोर्चा को भी भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने के लिए राजी कर लिया। अन्य नेताओं के लिए यह संभव नहीं था। मृदुभाषी होने के कारण विपक्षी दलों में उन्हें पसंद करने वाले नेता बहुतायत में हैं। 

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Posted By: Shashank Pandey