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    बॉक्सिंग की भूख ने विजेंद्र को दिलाई पहचान, आज दूसरे खिलाड़ियों के लिए बन रहे प्रेरणा

    Updated: Mon, 08 Jul 2024 10:05 AM (IST)

    भारत ने मुक्केबाजी में पुरुष वर्ग में अभी तक एक ही ओलंपिक पदक जीता है। उसे ये पदक साल 2008 में बीजिंग में खेले गए ओलंपिक खेलों में विजेंदर सिंह ने दिलाया था। लेकिन इसके बाद भारत के हिस्से पुरुष वर्ग में दूसरा ओलंपिक पदक नहीं आ सका है। विजेंदर को उम्मीद है कि इस साल ये सूखा खत्म होगा।

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    विजेंदर सिंह ने बीजिंग ओलंपिक-2008 में जीता था मेडल (PC- Vijender Singh)

     सुरेश मेहरा, जागरण भिवानी : साइकिल पर तो कभी ट्रैक्टर ट्रॉली से लटक कर बॉक्सिंग सीखने गांव कालुवास से भिवानी आने वाले मुक्केबाज विजेंद्र सिंह वर्ष 2008 के बीजिंग ओलंपिक में देश के लिए पदक जीतने वाले पहले मुक्केबाज बने तो बॉक्सिंग का जैसे बूम आ गया था। उनके बाद से अब तक पुरुष वर्ग में पदक नहीं आना भी चिंता पैदा करता है। यह भी सही है कि भूख किसी भी इंसान को उसका श्रेष्ठ मुकाम दिलाती है इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती।

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    देश के पहले ओलिंपिक पदक विजेता व अर्जुन अवार्डी मुक्केबाज विजेंद्र सिंह ने भी देश और दुनिया में पहचान बनाने से पहले बहुत कुछ देखा। वर्तमान में इन्फ्रास्ट्रक्चर से लेकर इंटरनेट जैसी सुविधाएं भी बहुत बढ़ी हैं। इंटरनेट पर तो इतनी सारी चीजे हैं जिनसे खिलाड़ी बहुत कुछ सीख सकते हैं। चाहे जो भी हो लक्ष्य पाने के लिए उस खेल की भूख जरूरी है। विजेंद्र सिंह यह उम्मीद भी कर रहे हैं कि इस बार पेरिस से हमारे मुक्केबाज पदक लेकर लौटेंगे।

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    बॉक्सिंग फेडरेशन और स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया में नहीं दिया अवसर

    ओलंपियन विजेंद्र सिंह ने दैनिक जागरण से दूरभाष पर विशेष बातचीत में बताया कि उन्होंने मेहनत के दम पर ओलंपिक पदक जीता। मुक्केबाजी में देश को बड़ी पहचान दिलाई। प्रोफेशनल मुक्केबाजी में भी पहचान दिलाई। उनके टैलेंट की अनदेखी ही रही। उन्हें बॉक्सिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया और स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया में अवसर नहीं दिया गया। मुक्केबाजी में और ज्यादा ओलंपिक पदक दिलाने के लिए उनके अनुभव का लाभ लिया जाता तो खिलाड़ियों के लिए कुछ बेहतर होता।

    साइकिल पर तो कभी ट्रैक्टर ट्रॉली पर लटक कर आते थे भिवानी

    विजेंद्र सिंह कहते हैं कि वो तो समय ही अलग था। मुक्केबाजी की भूख इतनी ज्यादा थी कि किसी भी तरह से नौकरी पानी है, बड़ा मुकाम पाना है। हम अल सुबह ही घर से साइकिल पर निकल लेते। कई बार दोस्तों के साथ साइकिल पर आते तो कई बार साइकिल नहीं होती तो पैदल ही चल पड़ते। रास्ते में कोई ट्रैक्टर मिल जाता तो उसकी ट्रॉली से लटक कर भिवानी पहुंच जाते। कई बार ऐसे अवसर भी आए कि गांव से पैदल ही भिवानी आ जाते। लक्ष्य एक ही था किसी तरह ऊंचा मुकाम हासिल करना है। हमारे कोच जगदीश सिंह ने कड़ी मेहनत कराई। वर्तमान में विजेंद्र सिंह राजनीति में भी मुख्य रूप से सक्रिय हैं। वह चुनाव भी लड़ चुके हैं। फिल्मी दुनिया में भी वह उतर चुके हैं और उनके फिल्में भी बॉलीवुड की नामी हस्तियों के साथ आ चुकी हैं।

    सुविधा और तकनीक के साथ कड़ी मेहनत दिलाएगी पदक

    बॉक्सर विजेंद्र सिंह ने बताया कि पहले के मुकाबले इन्फ्रास्ट्रक्चर और इंटरनेट की सुविधाएं जरूरी बढ़ी हैं। इनका खिलाड़ियों को भरपूर फायदा भी मिल रहा है पर बॉक्सिंग की भूख, कड़ी और नियमित मेहनत ही आपको पदक दिलाएगी। ऊंचा मुकाम दिलाएगी। वर्ष 2008 के बाद महिला वर्ग में मेरीकाम तो पदक लेकर आईं पर पुरुष वर्ग में दूसरा पदक नहीं आ पाया। हालांकि अच्छे मुक्केबाज भी रहे पर पदक नहीं मिल सका। इस बार हम उम्मीद कर रहे हैं हमारे मुक्केबाज पेरिस ओलंपिक में दमदार पंच लगाएंगे और पदक लेकर आएंगे।

    ओलंपिक कोटा हासिल करने के क्षण भी रोमांचित करने वाले रहे

    बात वर्ष 2004 के ओलंपिक से पहले की है। उस समय मैं 64 किलो भार वर्ग में खेल रहा था। पहला ओलंपिक वर्ष 2004 में कराची से क्वालीफाई किया। क्वालीफाई राउंड में ईरान के मुक्केबाज को हराया था। उनके साथ मुकाबला इतना ज्यादा कड़ा था कि मामूली अंतर से ही क्वालीफाई कर पाया था। मुझे याद है कि उस समय 27-30 का स्कोर हरा था और मैं तीन अंक से जीत गया था और ओलंपिक कोटा मिल गया था। इसके बाद दूसरा ओलिंपिक मैं वर्ष 2008 का बीजिंग ओलंपिक खेला था जिसमें देश के लिए पहला पदक जीता था। उस समय मैं 75 किलो भार वर्ग में खेला था। इस ओलंपिक के लिए कोटा पाने के लिए कजाक मुक्केबाज को हराया था और गोल्ड जीता था। बीजिंग मेरे लिए बहुत लकी रहा और देश के लिए कांस्य जीतना मेरे और खेल प्रेमियों के लिए बहुत बड़ी खुशी थी। इसके बाद वर्ष 2012 के लंदन ओलिंपिक के लिए कोटा चीन में प्राप्त किया।

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