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    लालू के आते ही आगे बढ़ा विपक्षी एकता का अभियान, ठिठक-सा गया था राष्ट्रीय मोर्चा बनाने का प्रयास

    By Jagran NewsEdited By: Shashank Mishra
    Updated: Wed, 15 Feb 2023 08:39 PM (IST)

    बिहार में भाजपा और महागठबंधन के दल आमने-सामने का मोर्चा संभाल चुके हैं। लालू के दिल्ली आने के मात्र तीन दिनों के भीतर तेजस्वी पहले तो रांची में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिलते हैं। फिर अगले ही दिन दिल्ली में लंबे अंतराल के बाद केजरीवाल से बात किये।

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    केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह 25 फरवरी को बिहार के बगहा में जनसभा को संबोधित करने जा रहे हैं।

    अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। अरविंद केजरीवाल से दिल्ली में तेजस्वी यादव की बात-मुलाकात के अर्थ तलाशे जा रहे हैं। यह सिर्फ दो नेताओं के सामान्य संवाद का मामला नहीं है। नीतीश कुमार के बिहार में भाजपा से अलग होने के बाद विपक्षी दलों को मिलाकर राष्ट्रीय मोर्चा बनाने का प्रयास प्रारंभिक कदमों के बाद ठिठक-सा गया था। लालू प्रसाद के सिंगापुर से लौटते ही इस प्रयास में प्रगति लाने का प्रयास प्रारंभ कर दिया गया है। आम आदमी पार्टी (आप) व राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के दोनों शीर्ष नेताओं के मिलने को इसी से जोड़कर देखा जा रहा है।

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    बिहार में भाजपा और महागठबंधन के दल आमने-सामने का मोर्चा संभाल चुके हैं। लालू के दिल्ली आने के मात्र तीन दिनों के भीतर तेजस्वी पहले तो रांची में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिलते हैं। फिर अगले ही दिन दिल्ली में लंबे अंतराल के बाद केजरीवाल से संवाद करते हैं। राजनीतिक मंच पर दोनों नेताओं की यह मुलाकात अगस्त 2018 के बाद हुई है।

    बातचीत का मूल विषय बाहर नहीं आ पाया है, लेकिन इसे मिशन-2024 से अलग करके नहीं देखा जा सकता है, क्योंकि केंद्रीय गृहमंत्री एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह 25 फरवरी को बिहार के बगहा में जनसभा को संबोधित करने जा रहे हैं। उसी दिन पूर्णिया में महागठबंधन की भी रैली प्रस्तावित है। स्पष्ट है कि गोलबंदी और शक्ति प्रदर्शन का प्रयास दोनों तरफ है। तेजस्वी के बुलावे पर हेमंत सोरेन और केजरीवाल पूर्णिया भी जा सकते हैं।

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    विपक्ष के बिखरे धड़ों को जोड़ने की पहल

    इसकी वजह भी है। भाजपा विरोध के नाम पर अभी तक विपक्ष दो धड़ों में बंटा दिख रहा है। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस अलग रास्ते पर चल रही है तो केजरीवाल एवं केसीआर की पटरी भी अलग है। ममता बनर्जी ने पत्ते नहीं खोले हैं। नीतीश कुमार का भी अलग कोण है। अपनी पार्टी का राष्ट्रीय नाम प्रदान करने के बाद तेलंगाना के खम्मम में केसीआर ने जनसभा बुलाने के बहाने विपक्षी राजनीति को दो दिशाओं में बढ़ने की राह बनाई।

    समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को तो बुलाया मगर नीतीश एवं तेजस्वी को बुलाने की जरूरत नहीं समझी। इन दोनों का कांग्रेस से वैसा विरोध तो बिल्कुल नहीं है जैसा केसीआर, अरविंद केजरीवाल और ममता का है। लालू का सोनिया गांधी से रिश्ता तो सर्वविदित है।

    तेजस्वी हुए अति सक्रिय

    बिहार में नीतीश कुमार की समाधान यात्रा में व्यस्तता के चलते तेजस्वी पूर्णिया रैली की तैयारियों की निगरानी अपने स्तर से कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर अति सक्रिय भी हो गए हैं।

    इसके पहले 16 फरवरी को उन्हें केसीआर की ओर से भी बुलावा आया था। जाने की तैयारी भी थी, पर अंतिम क्षण में कार्यक्रम को स्थगित कर दिया गया तो जाना टल गया।

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