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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 18, 2023 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Chandrayaan-3 को चंद्रमा तक पहुंचने में 40 दिन क्यों लग रहे हैं, जानिए क्या कहते हैं ISRO के वैज्ञानिक?

By Jagran NewsEdited By: Jagran News Network
Published: Tue, 18 Jul 2023 03:11 PM (IST)

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चंद्रयान-3 मिशन (Mission chandrayaan-3) को चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग (Soft Landing) की ...और पढ़ें

इसरो ने चंद्रयान-3 को चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग की प्रयास के लिए 14 जुलाई को लॉन्च किया था।
इसरो ने चंद्रयान-3 को चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग की प्रयास के लिए 14 जुलाई को लॉन्च किया था।

बेंगलुरु (कर्नाटक) ऑनलाइन डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चंद्रयान-3 मिशन (Mission chandrayaan-3) को चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग (Soft Landing) की प्रयास के लिए 14 जुलाई को लॉन्च किया था। अंतरिक्ष यान वर्तमान में अंतरिक्ष में घूम रहा है और 5 अगस्त तक चंद्रमा की कक्षा में पहुंचने की उम्मीद है। सॉफ्ट-लैंडिंग का प्रयास 23 अगस्त को होने की संभावना है। अंतरिक्ष यान पृथ्वी और चंद्रमा के बीच लगभग 3,84,000 किलोमीटर की दूरी लगभग 40 दिनों में तय करेगा। 40 दिन, जो नासा (NASA) द्वारा लॉन्च किए गए अपोलो मिशन (Apollo Mission) से कहीं अधिक लंबा है।

इतना लंबा रास्ता क्यों अपना रहा है चंद्रयान-3?

अपोलो मिशन (Apollo Mission) संयुक्त राज्य अमेरिका के केप कैनावेरल से प्रक्षेपण के बाद केवल तीन दिनों में चंद्रमा पर पहुंच जाएगा, तो फिर भारत चंद्रमा तक इतना लंबा रास्ता क्यों अपना रहा है? क्या इसका मंगलयान कनेक्शन है? जबकि चंद्रयान-3 मिशन (Mission chandrayaan-3) को भारत के सबसे भारी रॉकेट, लॉन्च व्हीकल मार्क-III पर लॉन्च किया गया था, लेकिन यह अभी भी इतना मजबूत नहीं है कि मिशन को चंद्रमा के सीधे रास्ते पर ले जा सके। इसलिए, लंबी यात्रा तय कराया जा रहा है।

अंतरिक्ष में कैसे काम कर रहा है चंद्रयान-3?

पृथ्वी के चारों ओर चंद्रमा की अंडाकार कक्षा का मतलब है कि हमारे ग्रह से इसकी दूरी अलग-अलग है, जिससे मिशन में जटिलता की एक और परत जुड़ गई है। एक शक्तिशाली रॉकेट की कमी का मुकाबला करने के लिए, इसरो चंद्रमा के चारों ओर अपना रास्ता बनाने के लिए पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का उपयोग करता है, उसी तरह जैसे उसने मार्स ऑर्बिटर मिशन (एमओएम) यानी मंगलयान को मंगल की ओर धकेलने के लिए ग्रह के चारों ओर गुलेल का उपयोग किया था।

चंद्रयान-3 अपनी कक्षाओं को धीरे-धीरे बढ़ाने और चंद्रमा की कक्षा के साथ तालमेल बिठाने के लिए पृथ्वी से जुड़ी युक्तियों और चंद्र कक्षा सम्मिलन की एक श्रृंखला को नियोजित करता है। इन मिशनों में "द्वि-अंडाकार स्थानांतरण" की एक श्रृंखला नामक एक विधि का उपयोग किया गया था, जिसमें अंतरिक्ष यान की ऊर्जा को धीरे-धीरे बढ़ाने और इसके ट्रेजेक्टरी को एडजस्ट करने के लिए कई इंजनों को जलाना शामिल था।

यह विधि अधिक ईंधन-कुशल और लागत प्रभावी मिशनों की अनुमति देती है, लेकिन अपोलो मिशनों द्वारा उपयोग किए जाने वाले प्रत्यक्ष ट्रेजेक्टरी की तुलना में अधिक समय लेती है।

इसरो के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, "गुलेल का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अंतरिक्ष यान चंद्रमा की ओर यात्रा करने के लिए अपने वेग को बढ़ाने के लिए पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का उपयोग करता है। यह खगोल विज्ञान और भौतिकी की एक जटिल गतिशीलता है।" हालांकि, यह अपोलो मिशन की तुलना में लागत प्रभावी और ईंधन कुशल है, लेकिन कक्षाओं को ऊपर उठाने के लिए अधिक मात्रा में ईंधन की खपत करता है।