नई दिल्‍ली। कोरोना के प्रकोप से न तो कोई देश बचा है और न ही कोई खास बचा रह गया है। आलम ये है कि इसकी जद में आकर स्‍पेन की राजकुमारी की भी जिंदगी नहीं बच सकी। वहीं ब्रिटेन के राजुकमार प्रिंस चार्ल्‍स को भी क्‍वारंटाइन करना पड़ा। राष्‍ट्र प्रमुख या मंत्री या उनके संतरी कोई भी आज इसकी जद में आने से नहीं रहा है। विकासशील देशों की अपेक्षा विकसित कहे जाने वाले देशों में तो इसका रौद्र रूप देखने को मिल रहा है। दुनिया की महाशक्ति कहलाने वाला अमेरिका इसके सामने पार नहीं पा रहा है। यूरोप के बड़े देशों ने इसके आगे घुटने टेक दिए हैं। इटली के राष्‍ट्रपति को इसके सामने नतमस्‍तक होते और इसके आगे बेबस होते हुए पूरी दुनिया ने देखा है।

लेकिन दूसरी तरफ वो विकासशील देश हैं जिन्‍हें पश्चिम आज तक पिछड़ा मानता आया था। लेकिन वहां पर कोरोना का असर पश्चिम के मुकाबले कम देखने को मिला है। इन देशों में कहें तो शिक्षा का अभाव है। यहां के लोगों पश्चिम देशों के लोगों जितने अमीर नहीं हैं। यहां के लोगों के पास उनकी तरह तकनीक नहीं है। इसके बाद भी यहां पर कोरोना के मामले कम हैं। इसकी वजह काफी लंबी चौड़ी तो नहीं है, लेकिन हां आसान शब्‍दों में इसको समझ का फेर जरूर कहा जा सकता है। दरअसल, जिस कोरोना को लेकर पश्चिम देश शुरुआत में ढिलाई बरत रहे थे उसपर विकासशील देश शुरुआत से ही चिंतित भी थे और मुमकिन है कि अंदर ही अंदर अपनी रणनीति भी बना रहे थे।

कोरोना के मामले में यूरोप हो या अमेरिका इन सभी ने अपनी नींद तोड़ने में जो देरी की उसका खामियाजा आज यहां के लोग उठा रहे हैं। इतना ही नहीं आज भी इन देशों में लॉकडाउन और सोशल डिस्‍टेंसिंग को लेकर मजाक बनाने वालों की कमी नहीं है। अमेरिका में न्‍यूयॉर्क कोरोना की ताकत के आगे बुरी तरह से पस्‍त और बेबस है। लेकिन लोग प्रशासन के बताए निर्देशों को कड़ाई से नहीं ले रहे हैं। ऐसा ही दूसरे शहर और राज्‍यों का भी हाल है। यूरोप के कई देशों में इसकी वजह से क्‍वारंटाइन के नियमों को और कड़ा करना पड़ा है। अमेरिका में इसके लिए आतंकवाद विरोधी कानून लगाया गया है। इसका अर्थ है कि यदि कोई कोरोना संक्रमित व्‍यक्ति बाहर घूमता पाया गया तो उसके खिलाफ आंतकवाद फैलाने का मुकदमा चलाया जाएगा जिसमें उसको दस वर्ष तक की कैद हो सकती है। इन बातों को झुठलाना नामुमकिन है, लेकिन इनसे आंख फेर लेनाआसान है।

मार्च महीने में जब पाकिस्‍तान और भारत में कोरोना वायरस के मामले तेजी से बढ़ने लगे तो भारत ने जहां 21 दिनों का लॉकडाउन अपने यहां लागू किया वहीं पाकिस्‍तान के सिंध और पंजाब में इसको पहले ही लागू कर दिया गया था। इस दौरान जो कुछ तस्‍वीरें इन दोनों देशों के छोटे-छोटे शहरों से सामने आईं वो बेशक तारीफ के काबिल थीं। ऐसी ही एक तस्‍वीर बिहार से आई थी जिसमें दुकान और मदर डेयरी के बाहर कुछ गोले बना दिए गए थे जिनमें लोग खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। ऐसी ही तस्‍वीर दिल्‍ली, यूपी समेत दूसरी जगहों से भी सामने आई थी। पाकिस्‍तान के शहरों से भी इसी तरह की तस्‍वीरें सामने आई थीं। इन तस्‍वीरों के मायने बेहद साफ थे। ये बता रही थीं कि एक तरफ जहां यूरोप के पढ़े लिखे लोग जिन बातों को मजाक में ले रहे हैं उन्‍हें विकासशील देशों के गरीब लोग बेहद कड़ाई से मान रहे हैं। भारत और पाकिस्‍तान के सामने इस कोरोना वायरस को रोकने की अपनी चुनौतियां हैं। इसके बाद भी दोनों ही देश इस पर काबू पाने की जंग को बखूबी लड़ रहे हैं। यहां के लोगों को भले ही पिछड़ा कहा जाए लेकिन यही मुठ्ठी भर लोग और देश इंसान और इंसानियत को बचाने की जंग का अहम हिस्‍सा हैं।

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Posted By: Kamal Verma

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