जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्लूएस) को नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश में दस फीसद आरक्षण का प्रविधान करने वाले 103वें संविधान संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को बहस पूरी हो गई। कोर्ट ने सभी पक्षों की बहस पूरी होने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। इस मामले पर चीफ जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने साढ़े छह दिन सुनवाई की।

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश की दलीलें

याचिकाकर्ताओं ने आर्थिक आधार पर आरक्षण के कानून को संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ बताते हुए रद करने की मांग की है, जबकि सरकार ने कानून की तरफदारी करते हुए कहा कि अति गरीबों को आरक्षण का प्रविधान करने वाला कानून संविधान के मूल ढांचे को मजबूत करता है। आर्थिक न्याय की अवधारणा को सार्थक करता है इसलिए इसे मूल ढांचे का उल्लंघन करने वाला नहीं कहा जा सकता। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आठ नवंबर तक आ जाने की उम्मीद है क्योंकि सुनवाई पीठ की अध्यक्षता कर रहे चीफ जस्टिस यूयू ललित आठ नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं।

सभी केंद्रीय शिक्षण संस्थानों को 25 फीसद सीटें बढ़ाने के लिए कहा गया

पीठ के अन्य जज दिनेश महेश्वरी, एस.रविन्द्र भट, बेला एम त्रिवेदी और जेबी पार्डीवाला हैं। मंगलवार को केंद्र सरकार की ओर से पेश सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मामले में बहस करते हुए कहा कि ईडब्लूएस को दिए गए 10 फीसद आरक्षण से एससी, एसटी, ओबीसी या सामान्य वर्ग के हित प्रभावित नहीं होते क्योंकि सभी केंद्रीय शिक्षण संस्थानों को इसके लिए 25 फीसद सीटें बढ़ाने के लिए कहा गया है। मामले पर दोनों पक्षों की ओर से करीब 20 वकीलों ने बहस की।

केंद्र ने कहा, यह आरक्षण का एक नया प्रकार

केंद्र सरकार की ओर से अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल व सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बहस की। इसके अलावा मध्य प्रदेश, गुजरात आदि कुछ राज्यों ने भी कोर्ट में ईडब्लूएस को दस फीसद आरक्षण दिए जाने के कानून का समर्थन किया। केंद्र सरकार की ओर से कानून का बचाव करते हुए कहा गया था कि ईडब्लूएस आरक्षण एक अलग श्रेणी का आरक्षण है। यह आरक्षण का एक नया प्रकार है। इससे एससी, एसटी और ओबीसी के आरक्षण पर कोई असर नहीं पड़ता। एससी, एसटी को पहले से ही आरक्षण का भरपूर लाभ मिल रहा है।

आरक्षण की तय अधिकतम पचास फीसद की सीमा का उल्लंघन नहीं

सरकार की दलील थी कि ईडब्लूएस आरक्षण से आरक्षण की तय अधिकतम पचास फीसद की सीमा का उल्लंघन नहीं होता क्योंकि यह आरक्षण एससी, एसटी और ओबीसी आरक्षण के लिए तय पचास फीसद आरक्षण से अलग जनरल कैटेगरी के लिए तय बाकी के पचास फीसद की कैटेगरी से दिया गया है। सरकार को आर्थिक आधार पर गरीबों को आरक्षण देने का प्रविधान करने का अधिकार है। जबकि ईडब्लूएस आरक्षण को चुनौती देने वाले वकीलों का कहना था कि यह आरक्षण न सिर्फ बराबरी के सिद्धांत का उल्लंघन करता है बल्कि संविधान के मूल ढांचे का भी उल्लंघन करता है।

आरक्षण का विरोध करने वाले वकीलों का कहना था कि गरीबों को दिये जाने वाले दस फीसद आरक्षण से एससी, एसटी और ओबीसी के गरीबों को बाहर रखा जाना भेदभाव है। यह भी दलील थी कि संविधान के मुताबिक आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन हो सकता है न कि आर्थिक। सुप्रीम कोर्ट ने शुरुआत में ही विचार के लिए संवैधानिक सवाल तय किए थे। कोर्ट विचार करेगा कि ईडब्लूएस आरक्षण संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन तो नहीं करता। इस आरक्षण से एससी, एसटी और ओबीसी को बाहर रखे जाने से मूल ढांचे का उल्लंघन तो नहीं होता।

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Edited By: Arun kumar Singh

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