रियायती दर पर जमीन ले रहे निजी अस्पताल, लेकिन गरीबों के मुफ्त इलाज में आनाकानी; SC ने जारी किया नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने रियायती दर पर जमीन लेने वाले निजी अस्पतालों में गरीबों के मुफ्त इलाज और 10% बेड आरक्षित करने की शर्त का पालन न करने के आरोप पर केंद्र और सभी राज्यों को नोटिस जारी किया है। मैगसेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडेय की याचिका पर कोर्ट ने यह कदम उठाया।

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने रियायती दर पर जमीन लेने वाले निजी अस्पतालों में गरीबों के मुफ्त इलाज और उनके लिए 10 प्रतिशत बेड आरक्षित करने की शर्त का पालन न करने का आरोप लगाने वाली याचिका पर विचार का मन बनाते हुए नोटिस जारी किया है। शुक्रवार को कोर्ट ने यह मुद्दा उठाने वाली मैगसेस पुरस्कार सम्मानित संदीप पांडेय की याचिका पर केंद्र व सभी राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
ये नोटिस प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने पांडेय की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख की दलीलें सुनने के बाद जारी किये। पारिख ने याचिका पर बहस करते हुए कहा कि निजी अस्पतालों को रियायती दर पर इस शर्त के साथ जमीन दी गई थी कि वे गरीबों का मुफ्त इलाज करेंगे और उनके लिए एक निश्चित संख्या में बेड आरक्षित करेंगे। लेकिन ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है जिसमें साबित होता हो कि निजी अस्पताल इस शर्त का पालन करते हैं।
दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल का दिया उदाहरण
कोर्ट ने मामले को महत्वपूर्ण मानते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया। याचिका में सीएजी रिपोर्ट को आधार बनाया गया है जिसमें निजी अस्पतालों द्वारा रियायती दर पर जमीन आवंटन की शर्त में गरीबों के मुफ्त इलाज और उनके लिए एक निश्चित संख्या में बेड आरक्षित करने की शर्त का पालन नहीं किया जा रहा है। याचिका में कहा गया है कि विभिन्न राज्यों जिसमें दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, उड़ीसा, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, और अन्य राज्य शामिल हैं उनमें रियायती दर पर जमीन पाने की शर्त का पालन होने में स्टेमेटिक नाकामी पाई गई।
निजी अस्पताल गरीब मरीजों को भर्ती करने के लिए 10 फीसद बेड आरक्षित नहीं कर रहे और न ही 25 फीसद आउट डोर गरीब मरीजों को कंसल्टेशन दिया जाता है। याचिका में दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल का उदाहरण दिया गया है जिसे रियायती दर पर जमीन इस शर्त पर दी गई थी कि वह 600 में से 200 बेड यानी एक तिहाई बेड गरीबों के मुफ्त इलाज के लिए आरक्षित करेगा। इस शर्त के बावजूद दिल्ली हाई कोर्ट ने सोशल ज्युरिस्ट बनाम जीएनसीटी की याचिका पर दिये फैसले में 22 मार्च 2007 को कहा था कि इन वर्षों में अथॉरिटीज ने विभिन्न अस्पतालों की निगरानी नहीं की है जिससे जनता को लाभ नहीं मिला।
डेवलपमेंट कंट्रोल रेगुलेशन के तहत मांग
हाई कोर्ट ने फैसले में ज्वाइंट कमेटी के गठन और पेनाल्टी लगाने का आदेश दिया था जिसे 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था। याचिका में कहा गया है कि महाराष्ट्र में सीएजी की पांच अगस्त 2008 की रिपोर्ट कहती है कि 113 राज्य सहायता प्राप्त पब्लिक ट्रस्ट अस्पतालों में से सिर्फ 11 का टेस्ट चेक हुआ और उसमें से ज्यादातर डिफॉल्टर पाए गए। इनमें बांबे हास्पिटल, लीलावती हास्पिटल, सैफी हास्पिटल, पीडी हिंदुजा हास्पिटल शामिल हैं जिन्हें डेवलपमेंट कंट्रोल रेगुलेशन के तहत अतिरिक्त एफएसआई मिला था जिसमें गरीबों के लिए 20 फीसद मुफ्त बेड आरक्षित करने और 10 फीसद ओबीडी में गरीबों को मुफ्त इलाज देने की शर्त थी।
हरियाणा में सब्जेक्ट कमेटी रिपोर्ट 2018 में आयी जिसमें 2008 से 2016 की स्थित बताई गई। जिसमें कहा गया कि इसके अनुपालन की निगरानी के लिए निगरानी कमेटी की कोई बैठक नहीं हुई। एक मामला सामने आया जिसमें 2017 में 64000 मरीज भर्ती हुए जिसमें कमजोर वर्ग के सिर्फ 118 मरीजों का इलाज हुआ। अन्य राज्यों का भी उदाहरण दिया गया है। याचिका में रियायती दर पर जमीन पाने वाले निजी अस्पतालों में गरीबों के मुफ्त इलाज की शर्त के अनुपालन की मांग की गई है।
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