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    sivakasi: सूखे पड़े शहर में रोजगार की बारिश कर दी थी दो भाइयों ने, यहां होता है पटाखों का सबसे ज्यादा उत्पादन

    By Nidhi AvinashEdited By:
    Updated: Sat, 22 Oct 2022 04:29 PM (IST)

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    यहां होता है पटाखों का सबसे ज्यादा उत्पादन

    नई दिल्ली। आनलाइन डेस्क। Sivakasi। दिवाली का त्योहार पूरे देश में धूम-धाम से मनाया जा रहा है। दिवाली के त्योहार से पहले ही बाजारों में रौनक बढ़ जाती है। देशभर में लोग सोना-चांदी से लेकर कई कीमती चीजें खरीदते है। लेकिन एक चीज है जिसके बिना बच्चें और युवाएं रह नहीं सकते और इसकी खरीदारी के लिए हमेशा उत्सुक रहते हैं। हम बात कर रहे हैं पटाखों की। पटाखों के बिना तो शायद ही किसी ने दिवाली मनाई होगी। ये एक ऐसी चीज है जो हर कोई खरीदता है। लेकिन देश के अनेक राज्यों में पटाखों के कारण प्रदुषण भी तेजी से फैला है।

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    प्रदुषण के कारण दिवाली पर्व बहुत फीकी हो गई है। देश के कई राज्यों में पटाखे फोड़ने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। दिल्ली-एनसीआर में भी पटाखों को जलाने पर पूरी तरह से रोक लग गई है। हालांकि, कुछ राज्यों में पटाखे चलाने की छूट भी दी गई है। वहीं कुछ राज्यों ने ग्रीन पटाखे चलाने की अनुमति दी है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली पर पटाखों की जगह मिठाई पर खर्च करने की सलाह दी है।

    चीन के बाद भारत करता पटाखों का सबसे ज्यादा प्रोडक्शन

    चीन में पटाखों का आविष्कार हुआ। इस देश में पटाखों का इस्तेामल बुरी शक्तियों को भगाने के लिए किया जाता था। धीरे-धीरे पटाखों का निर्माण भारत में भी होने लगा। दिवाली में जो आप पटाखे जलाते है उसका सबसे ज्यादा निर्माण भारत के कौन से राज्य में होता है, इसकी जानकारी शायद बहुत ही कम लोगों को होगी। लेकिन आज हम आपको बताएंगे उस शहर के बारे में जिसे लिटिल जापान आफ इंडिया कहा जाता है और ये किस चीज के लिए सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है।

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    पटाखों के बिना अधूरी शिवकाशी

    शिवकाशी शहर को अगर किसी चीज से पहचान मिली तो वो है पटाखे। दिवाली से नाता रखने वाला शिवकाशी, भारत के तमिलनाडु राज्य के विरुधुनगर जिले में एक शहर और नगर निगम है। आतिशबाजी के उत्पादन के लिए शिवकाशी काफी प्रसिद्ध है। शिवाकाशी में 20वीं शताब्दी की शुरूआत में पहला फायर उद्योग शुरू किया गया था। शिवकाशी में करीब 6 हजार करोड़ पटाखे का कारोबार किया जाता था। लेकिन जब से ग्रीन पटाखों पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश और बेरियम पर प्रतिबंध लगा है तब से शिवकाशी में चीजें बदल सी गई।

    दो भाइयों के कारण शिवकाशी को मिली पटाखे से पहचान

    दो भाइयों के कारण ही शिवकाशी का नाम आज पूरा भारत जानता है। जिस शिवकाशी में सूखा रहता था वहीं इन दो भाइयों ने लोगों के घरों में धन की बारिश कर दी। कैसे सूखे से बेहाल शहर को रोशनी से भरे उद्योग में तब्दील कर दिया । इसकी कहानी इन दो भाइयों से ही शुरू होती है। इन दो भाइयों का नाम है- शानमुगा नाडर और पी अय्या नाडर। शिवकाशी की तार कोलकाता से जुड़ी हुई है। बता दें कि कोलकाता में 19वीं सदी की शुरूआत में माचिस की एक फैक्ट्री चलाई जाती थी।

    सूखा और रोजगार की कमी को देखते हुए दोनो भाइयों ने कोलकाता की फैक्ट्री में काम किया। यहां माचिस बनाते हुए पटाखे निर्माण के बारे में भी जाना और वापस अपने शहर शिवाकाशी लौट आए जहां से पटाखों के निर्माण की कहानी शुरू हुई। शहर में सूखा पड़े रहने से पटाखे के काम वरदान साबित हुआ। दोनों भाइयों ने धीरे-धीरे पूरे शहर में आतिशबाजी उद्योग की शुरूआत की।

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    शिवकाशी में होता था 90% पटाखों का उत्पादन

    हालांकि, अब शिवकाशी में पटाखों के उत्पादन में 40 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने बेरियम रसायन के इस्तेमाल पर रोक लगाते हुए पोटेशियम नाइट्रेट और स्ट्रोटियम नाइट्रेट के उपयोग का भी सुझाव दिया है। कई पटाखें कपंनियों का कहना है कि स्ट्रोंटियम नाइट्रेट भारत में आसानी से उपलब्ध नहीं होते, इसे आयात करना पड़ता है। जिस शहर ने पिछले 70 वर्षों में देश के 90% पटाखों का उत्पादन किया, आज वहीं लोग रोजगार पाने के लिए इधर-उधर भटक रहे हैं।

    पटाखों के बैन से 1400 अवैध पटाखे यूनिट बंद हो गई है, जिसके कारण पटाखे बनाने वाले मजदूरों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ गया है। जानकारी के लिए बता दें कि शिवकाशी की पटाखा फैक्ट्रियां करीब 2,500 करोड़ रुपए की आतिशबाजी का उत्पादन करती थी और खुदरा बिक्री में उन्हें 6,000 करोड़ रुपए तक बेच सकती थी। शिवकाशी फायरवर्क्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (एसएफएमए) के उपाध्यक्ष ए. मुरली ने बताया कि कई राज्य सरकारों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के अलावा पटाखों का कारोबार वर्तमान में समस्याओं का सामना कर रहा है।

    हरे पटाखों से कितने सुरक्षित हम

    सुप्रीम कोर्ट ने लोगों के स्वास्थ्य को देखते हुए दिवाली के दौरान ग्रीन या हरे पटाखे जलाने के आदेश दिए है। ग्रीन पटाखे बनाने का काम सीएसआइआर-राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (एनइइआरआइ) को सौंपा गया है। इसके बाद नीरी ने एक ऐसा फॉर्मूला लेकर आया जिसने ग्रीन क्रैकर्स बनाने में मदद की। हालांकि, ग्रीन क्रैकर्स बनाने का फॉर्मूला केवल उन 1,000 कंपनियों को दिया गया था जो नीरी के साथ एक गैर-प्रकटीकरण समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार थीं। इसके कारण कई कारखाने अभी भी हरे पटाखे बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मजदूरों की कमी के कारण उत्पादन में कमी आई है।

    बता दें कि 20 से 30 प्रतिशत पटाखों का निर्माण नहीं किया जा रहा है। बेरियम में प्रतिबंध के कारण एक लाख से अधिक लोगों ने अपनी नौकरी खो दी है। फेडरेशन ऑफ तमिलनाडु फायरवर्क्स ट्रेडर्स के अध्यक्ष वी राजा चंद्रशेखरन ने वर्तमान स्थिति की तुलना 2016-17 से की जिसमें पाया गया कि पटाखों की बिक्री में 40 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। कई राज्यों द्वारा 2021 में पटाखों पर प्रतिबंध लगाने के बाद भी व्यापारियों को नुकसान हुआ। हरे पटाखे 30 फीसदी कम वायु प्रदूषण करते हैं और इसमें बेरियम नाइट्रेट जैसे खतरनाक तत्व नहीं होते हैं। बता दें कि ग्रीन पटाखों को जलाने की अनुमति सिर्फ उन्हीं शहरों में दी गई है, जहां हवा की गुणवत्ता मध्यम या खराब है।

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    शिवकाशी शहर पर बनाई गई तमिल फिल्म

    आतिशबाजी व्यवसाय में शिवाकाशी शहर देशभर में सबसे आगे रहने वाले शहरों में से एक है। इस शहर को न केवल लोगों द्वारा बल्कि सिनेमा उघोग ने भी काफी पसंद किया। बता दें कि साल 2005 में शिवकाशी शहर के ऊपर एक तमिल फिल्म भी बनाई गई है। इस फिल्म का नाम भी शिवकाशी है। ये फिल्म रोमांटिक-एक्शन से भरी हुई है और ये दिवाली पर ही रिलीज हुई थी।