नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। बीमा पॉलिसी देते वक्त कंपनियां ऐसे सपने दिखाती हैं, मानों पॉलिसी लेने से आपकी सारी दुश्वारियां व चिंताएं खत्म हो जाएंगी। हालांकि, मुश्किलों की शुरूआत तब होती है जब जरूरत पड़ने पर बीमा कंपनी से क्लेम मांगने की बारी आती है। उस वक्त बीमा कंपनी क्लेम न देने के लिए वो सारे बहाने (गोपनीय नियम व शर्तें) बताती हैं, जिनका आपके सामने कभी जिक्र भी नहीं किया गया होगा। CRPF के एक शहीद जवान का परिवार चार साल से बीमा कंपनी के ऐसे ही बहाने सुन रहा है। इस शहीद जवान की कहानी आपके लिए भी एक सबक है कि बीमा लेते वक्त पूरी सतर्कता बरतें।

CRPF के ये शहीद जवान हैं डिप्टी कमांडेंट हीरा कुमार झा, जिन्होंने 04 जुलाई 2014 को बिहार के जमुई इलाके में नक्सलियों संग हुई एक बड़ी मुठभेड़ में शहादत दी थी। राष्ट्रपति द्वारा वर्ष 2016 में उनकी शहादत को शौर्य चक्र देकर सम्मानित किया गया था। उन्हें शहीद हुए चार साल से ज्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन बीमा कंपनी उनकी पत्नी बीनू झा को मुआवजे के 10 लाख रुपये देने को तैयार नहीं है।

शहीद हीरा कुमार के परिवार के अनुसार सीआरपीएफ के बड़े अधिकारी खुद बीमा कंपनी से इस संबंध में लगातार बात कर रहे हैं। उनकी पैरोकारी के बाद भी बीमा कंपनी मुआवजा देने को तैयार नहीं है। सीआरपीएफ अधिकारियों ने इस संबंध में बीमा कंपनी के मुंबई स्थिति मुख्यालय में भी बात की, लेकिन कोई रास्ता नहीं निकला। लिहाजा सीआरपीएफ अपने जवान को इंसाफ दिलाने के लिए अब कोर्ट जाने का मन बना रही है।

बीमा कंपनी ने बताई बेतुकी वजह
क्लेम न देने के लिए बीमा कंपनी ने सीआरपीएफ और शहीद के परिवार को बताया है कि डिप्टी कमांडेट हीरा कुमार झा जिस इलाके में नक्सलियों संग मुठभेड़ में शहीद हुए थे, वह इलाका कंपनी के रिकॉर्ड में नक्सल प्रभावित क्षेत्र नहीं है। इतना ही नहीं बीमा कंपनी ने क्लेम न देने के पीछे एक और चौंकाने वाली वजह बताई है। बीमा कंपनी का कहना है कि शहीद सीआरपीएफ जवान झारखंड राज्य से बीमा के लिए नामित थे, लेकिन वह बिहार राज्य में मुठभेड़ के दौरान शहीद हुए हैं। इसलिए कंपनी अपनी बीमा पॉलिसी की नियम व शर्तों के अनुसार शहीद के परिवार को क्लेम नहीं दे सकती है।

नक्सलियों का पीछा करते हुए दूसरे राज्य में चले गए थे
सीआरपीएफ के डिप्टी कमांडेंट हीरा कुमार 04 जुलाई 2014 को जब शहीद हुए तो वह अपनी बटालियन के साथ झारखंड में तैनात थे। उन्हें पुख्ता सूचना मिली थी कि झारखंड-बिहार सीमा पर नक्सलियों का एक बड़ा गिरोह मौजूद है। सूचना मिलते ही वह अपने जवानों को लेकर नक्सलियों की तलाश में निकल गए। जब बात दुश्मन से मुकाबला करने की हो तो जवान के लिए सीमाएं मायने नहीं रखती। इस मामले में भी यही हुआ। नक्सलियों का पीछा करते-करते डिप्टी कमांडेंट हीरा कुमार झा अपने जवानों के साथ झारखंड राज्य की सीमा पार कर बिहार के जमुई इलाके में पहुंच गए।

भारी मात्रा में हथियार व विस्फोटक हुआ था बरामद
डिप्टी कमांडेंट हीरा कुमार झा जिन नक्सलियों का पीछा कर रहे थे, वह संभवतः बड़ी तबाही मचाने की फिराक में थे। उनके पास काफी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद मौजूद था। चार जुलाई की सुबह-सुबह सीआरपीएफ की नक्सलियों से जबरदस्त मुठभेड़ हो गई। दोनों तरफ से अंधाधुंध हुई फायरिंग में कई नक्सली मारे गए और सीआरपीएफ ने उनसे भारी मात्रा में हथियार और विस्फोटक बरामद कर लिया। हालांकि, इस मुठभेड़ में डिप्टी कमांडेंट हीरा कुमार झा शहीद हो गए।

CRPF ने अब राज्य सरकार से की हस्तक्षेप की मांग
झारखंड में सीआरपीएफ के प्रवक्ता बादल प्रकाश ने बताया कि शौर्य चक्र प्राप्त डिप्टी कमांडेंट हीरा कुमार जुलाई 2014 में नक्सलियों से मुठभेड़ में शहीद हुए थे। बीमा कंपनी उनके परिवार को मृत्यु बीमा नहीं दे रही है। बीमा कंपनी का कहना है कि वह झारखंड में उनकी शहादत होने पर ही भुगतान कर सकती थी। मामले को सुलझाने के लिए बीमा कंपनी के मुंबई स्थित हेडऑफिस से भी संपर्क किया गया है। अभी तक कोई हल नहीं निकला। लिहाजा, मामले में राज्य सरकार से अनुरोध किया गया है कि वह इस मामले को स्पेशल केस मानते हुए शहीद के परिवार के लिए दस लाख रुपये की अनुग्रह राशि का अलग से भुगतान करे। राज्य सरकार का रुख सकारात्मक है। उम्मीद है कि शहीद के परिवार को जल्द ही यह अनुग्रह राशि प्राप्त हो जाएगी। रही बात, बीमा कंपनी से मुआवजा लेने कि तो शहीदा का परिवार या सीआरपीएफ द्वारा मामले में कोर्ट में केस दायर करने पर भी विचार किया जा रहा है।

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