न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ निराधार आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, अवमानना की कार्रवाई की चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी रद्द कर दी, जिन पर एक्साइज एक्ट के तहत भ्रष्टाचार के आरोप थे। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट क ...और पढ़ें

मध्य प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी को रद कर दिया गया
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मध्य प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी को रद कर दिया, जिन पर एक्साइज एक्ट के तहत आरोपितों को जमानत देने में भिन्न मापदंड अपनाने और भ्रष्टाचार में लिप्त होने का आरोप था।
पीठ ने ट्रायल कोर्ट के न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ निराधार आरोपों की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीरता से ध्यान दिया और ऐसे अधिकारियों की सुरक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया। जस्टिस जेबी पार्डीवाला और केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि न्यायिक अधिकारी को 27 वर्षों की ''दाग रहित'' सेवा के बाद उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना बर्खास्त किया गया।
शीर्ष अदालत की अहम टिप्पणी
शीर्ष अदालत ने अवलोकन किया, ''यह कारण है कि ट्रायल कोर्ट के अधिकारी जमानत देने में हिचकिचाते हैं और उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट पर जमानत याचिकाओं का बोझ बढ़ता है।'' हालांकि, उसने भ्रष्टाचार में लिप्त न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई समेत कठोर कार्रवाई करने का समर्थन किया ताकि न्यायपालिका से ''काली भेड़'' को बाहर निकाला जा सके।
पीठ ने यह भी बताया कि बार के सदस्य भी न्यायपालिका के सदस्यों के खिलाफ निराधार आरोप लगाने में लिप्त हैं और चेतावनी दी कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है। जस्टिस पार्डीवाला ने निर्णय से सहमति जताते हुए जस्टिस विश्वनाथन द्वारा लिखित निर्णय की सराहना की, इसे ''बहुत साहसी निर्णय'' बताते हुए कहा कि यह ईमानदार न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश के न्यायिक अधिकारी निर्भय सिंह सुलिया को उनकी सेवा से सेवानिवृत्ति तक पूर्ण मौद्रिक लाभ का भुगतान करने का निर्देश दिया और सितंबर 2015 के बर्खास्तगी आदेश और उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद कर दिया जिसने उनकी बर्खास्तगी को बरकरार रखा।

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