शेषनाथ राय, भुवनेश्वर (ओडिशा)। Right to Information Act देश को दीमक की तरह खोखला करते भ्रष्टाचार पर लोकतांत्रिक तरीके से वार करने के क्रम में अपनी जान गंवा देने वाले अमर सेनानी हैं- अभिमन्यु पांडा। ओडिशा के आदिवासी बहुल कंधमाल जिले के सामान्य परिवार से आने वाले इस लाल ने सूचना का अधिकार (आरटीआइ) को हथियार बनाया। भ्रष्टाचार के कई केस उजागर किए। माफिया के लोभ-लालच के बावजूद जब नहीं झुके तो हत्या कर दी गई। पर, भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी जंग अब भी जारी है। इसके वाहक बन गए हैं उनके कई दोस्त।

अभिमन्यु पांडा के दोस्त प्रदीप प्रधान भी उन्हीं की तरह सक्रिय आरटीआइ कार्यकर्ता हैं। वे बताते हैं कि अभिमन्यु ने सबसे पहले कंधमाल जिले के बालीगुड़ा में मौजूद जगन्नाथ मंदिर, जो माफिया के कब्जे में था, उसे वर्ष 2016 में सबके सामने लाकर रख दिया। इस मंदिर में मौजूद 32 दुकानों पर माफिया का कब्जा था। सूचना का अधिकारी कानून से मिली जानकारी को आधार बनाकर उन्होंने मंदिर की संचालन कमेटी भंग करने के लिए हाईकोर्ट में केस कर दिया। हाईकोर्ट ने जांच के आदेश दिए और कमेटी भी भंग हो गई। फिर बालीगुड़ा क्षेत्र में अवैध शराब दुकानों को अभिमन्यु ने बंद करवा दिया। यही नहीं करीब तीन करोड़ की लागत से निर्मित कंधमाल महाविद्यालय सारंगगड़ हास्टल निर्माण में हुए भ्रष्टाचार को भी सार्वजनिक कर दिया। सफर यहीं नहीं थमा। उन्होंने जनवितरण प्रणाली की दुकानों में फैले भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए एकमुश्त करीब 50 आवेदन दाखिल कर दिए।

फिर तो ठेकेदार से लेकर शासन-प्रशासन तब अभिमन्यु के दुश्मन हो गए। जब कोई बस नहीं चला तो साजिश के तहत अभिमन्यु की हत्या कर दी गई। स्व. अभिमन्यु पांडा के दोस्त प्रदीप प्रधान कहते हैं कि लोगों के विरोध एवं हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद बालीगुड़ा में शराब की दुकान बंद कर दी गई है। जनवितरण प्रणाली वाले मामले में राज्य सूचना आयोग के पास सुनवाई जारी है। इसी तरह निर्माण में हुए भ्रष्टाचार मामले में सुंदरगढ़ जिला प्रशासन ने जांच के आदेश दिए गए हैं। अभी जांच पूरी नहीं हुई है।

प्रदीप प्रधान कहते हैं कि भ्रष्टाचार में शामिल माफिया सत्ताधारी पार्टी बीजद से संबंध रखते हैं। हत्या के बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राज्य सरकार पर जब दबाव बनाया तो प्रशासन ने कुछ आरोपितों को तो गिरफ्तार किया। लेकिन पर्दे के पीछे साजिश रचने वाले अबतक हत्थे नहीं चढ़े हैं। वे इतने ताकतवर हैं कि सुपारी देकर हत्या कराते हैं। खुद सामने नहीं आते हैं। ऐसे में इन्हें गिरफ्तार करने के लिए सीबीआइ या एसआइटी जांच की मांग की जा रही है। हत्या के पीछे कौन लोग हैं, उनका चेहरा आम लोगों के सामने आना चाहिए, जो अभी तक नहीं आ पा रहा है।

स्व. अभिमन्यु पांडा की पत्नी छवि रानी पांडा कहती हैं कि हत्याकांड के सभी आरोपित पकड़े जा चुके हैं। लेकिन जिन सफेदपोश लोगों के इशारे पर हत्या हुई, उन तक पुलिस नहीं पहुंच पाई। क्योंकि वे सीधे तौर पर हत्या में शामिल नहीं थे। यदि सीबीआइ जांच होती तो साजिश रचने वाले सफेदपोश भी पकड़े जाते। उनके नाम उजागर होते। यही वजह है कि इस मामले में सीबीआइ जांच की मांग की जा रही है। 14 साल में 40 पर हमला, चार की हो चुकी हत्या: प्रदीप प्रधान बताते हैं कि ओडिशा में आरटीआइ कार्यकर्ता महफूज नहीं हैं। कार्यकर्ताओं पर हमले की तुरंत जांच भी नहीं होती है। राज्य में 14 वर्षों के दौरान 40 आरटीआइ कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले हो चुके हैं। भ्रष्टाचार उजागर करने वालों के हाथ पैर तोड़ दिए जाते हैं।

छवि रानी पांडा, अभिमन्यु पांडा की पत्नी ने बताया कि पति के निधन के बाद परिवार बिखर गया है। बच्चों की पढ़ाई रुक गई है। अब आय का कोई स्रोत रहा नहीं। चाहती हूं कि राज्य सरकार दोषियों को सजा दे और बेटा-बेटी की पढ़ाई के लिए कदम उठाए।

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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