विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली। जीवन का संघर्ष इंसान को हर कदम ताकतवर बनाने के साथ ही हक के लिए आत्मबल के साथ आगे बढ़ने की हिम्मत देता है। कुछ ऐसी ही कहानी है सूचना का अधिकार (आरटीआइ) कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल की। पिता के खिलाफ दर्ज कराए गए एक झूठे मुकदमे के खिलाफ अदालतों में गुजरे 16 साल के संघर्ष ने उनमें हक के लिए लड़ने का जज्बा पैदा किया।

न्यायिक प्रणाली से मिली पीड़ा से क्षुब्ध सुभाष ने इसके खिलाफ ही मुहिम छेड़ दी। आखिरकार उन्हें इसमें तब सफलता मिली जब सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार माना कि मुख्य न्यायाधीश (सीजेआइ) का कार्यालय भी आरटीआइ के अधीन आता है। जीवन के संघर्षों के बीच सुभाषचंद्र का सफर जारी है। दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से स्नातक और फिर मार्केटिंग एंड सेल्स मैनेजमेंट में परास्नातक की डिग्री हासिल करने वाले सुभाषचंद्र आइएएस बनना चाहते थे, लेकिन परिवार के दवाब के कारण वह पारिवारिक व्यवसाय से ही जुड़ गए।

70 वर्षीय सुभाषचंद्र बताते हैं कि व्यवस्था को दळ्रुस्त करने को लेकर उनका यह संघर्ष पिता के खिलाफ दर्ज हळ्ए एक झूठे मुकदमे के विरुद्ध लड़ाई से शुरू हुआ। दिल्ली के चांदनी चौक निवासी सुभाषचंद्र के चाचा ने वर्ष 1991 में संपत्ति को लेकर उनके पिता पर झूठा मुकदमा दर्ज करा दिया था। सुभाष के चाचा के दामाद का दिल्ली हाई कोर्ट के एक न्यायमूर्ति से करीबी संबंध था।

सुभाष चंद्र बताते हैं कि इसी कारण से उनके परिवार को प्रताड़ित किया गया। तीन जनवरी 2005 को सुभाष चंद्र ने संबंधित न्यायमूर्ति के खिलाफ तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश से शिकायत भी की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। व्यवस्था से हताश सुभाष चंद्र को सूचना का अधिकार-2005 के बारे में पता चला। उन्होंने अक्टूबर 2005 में सुप्रीम कोर्ट में सूचना के अधिकार के तहत पूछा कि न्यायमूर्ति के खिलाफ उनके द्वारा की गई शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई। इसका जवाब नहीं मिला।

बताते हैं, हालांकि शिकायत की एक प्रति मैंने राष्ट्रपति को भी भेज दी थी। राष्ट्रपति कार्यालय ने इसे सुप्रीम कोर्ट को भेज दिया तो कोर्ट ने इसका संज्ञान लिया। इसके बाद कोर्ट ने पहली बार माना कि मेरा वह मामला सूचना के अधिकार के तहत आता है। अखबारों में ये प्रकरण सुर्खियां बना तो वर्ष 2006 में दबाव में आकर सुभाष के चाचा ने उनके परिवार से समझौता कर लिया था। वह कहते हैं, व्यक्तिगत संघर्ष ने अब तक मळ्झे मानसिक तौर पर और मजबूत करने के साथ ही संघर्ष करने का एक नया हौसला दे दिया था।

क्या सीजेआइ को सभी न्यायमूर्ति अपनी संपत्ति का ब्योरा देते हैं?

सळ्भाष चंद्र ने नवंबर 2007 में याचिका दाखिल कर सुप्रीम कोर्ट से पूछा कि क्या सीजेआइ को सभी न्यायमूर्ति अपनी संपत्ति का ब्योरा देते हैं? जब वहां से उन्हें जवाब नहीं मिला तो उन्होंने केंद्रीय सूचना आयुक्त (सीआइसी) के पास अपील दायर की। सीआइसी ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्रार विभाग को कहा कि मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय आरटीआइ के अधीन है और इस आधार पर सूचना उपलब्ध कराई जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार विभाग ने दी चुनौती

सीआइसी के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्रार विभाग ने जनवरी 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दे दी। दिल्ली हाईकोर्ट ने सीआइसी के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का कार्यालय भी सार्वजनिक प्राधिकरण है और इसे सूचना के अधिकार कानून के अंतर्गत लाया जाना चाहिए। हाई कोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्रार विभाग ने नवंबर 2010 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

13 नवंबर 2019 को आया बड़ा फैसला

मामले की सुनवाई के लिए गठित की गई संवैधानिक पीठ ने 13 नवंबर 2019 को फैसला सुनाते हुए कहा कि स्पष्ट किया कि मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय भी आरटीआइ के अधीन आता है। इसके अलावा सुभाष ने राजनीतिक पार्टियों को आरटीआइ के दायरे में लाने में भी अहम भूमिका निभाई। साथ ही उनके द्वारा आरटीआइ में मांगी गई जानकारी के बाद कई घोटाले से लेकर अहम जानकारियां बाहर आईं।

गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज नाम

वर्ष 1967 से देश के बड़े अखबारों में तीन श्रेणियों में संपादक के नाम पत्र लिखने वाले सुभाष चंद्र अग्रवाल के नाम पर गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड में रिकॉर्ड दर्ज है। संपादक के नाम 1,226 पत्र लिखने पर 31 जनवरी 2002 को गिनीज बुक में यह रिकॉर्ड दर्ज हुआ। अब तक संपादक के नाम 3,599 से अधिक पत्र लिख चुके सुभाषचंद्र के नाम पर सबसे अधिक संख्या में संपादक के नाम पत्र प्रकाशित होने का गिनीज रिकॉर्ड भी है। वहीं एक श्रेणी में संपादक के नाम पत्र लिखने वाली उनकी पत्नी मधु अग्रवाल का नाम भी वर्ष 2004 में गिनीज बुक में शामिल हुआ।

नागरिक अधिकारों के सशक्तीकरण की राह सळ्भाष चंद्र अग्रवाल ने एक अखबार को पहला पत्र दिल्ली परिवहन निगम के बस कंडक्टर के बारे में लिखा था। इसमें उन्होंने इस बात का रहस्योद्घाटन किया था कि बस कंडक्टर टिकट के बिना यात्रियों से पैसे वसूल कर रहा है।

जिराफ हीरो पुरस्कार से भी सम्मनित

अमेरिकी स्वयंसेवी संगठन जिराफ हीरोज प्रोजेक्ट ने 22 जनवरी 2015 को सुभाष चंद्र अग्रवाल को जिराफ हीरो पुरस्कार 2015 से सम्मानित किया। अग्रवाल को यह पुरस्कार असंख्य चुनौतियों का सामना करते हुए सार्वजनिक भलाई के लिए सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 का प्रयोग करने के लिए प्रदान किया गया था। जिराफ हीरोज प्रोजेक्ट एक गैर लाभकारी संस्थान है जो जोखिम उठाने वाले अनजान लोगों, जिनमें दुनिया के आम लोगों के लिए जोखिम उठाने का साहस है, उन्हें सम्मानित करता है।

आरटीआइ कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल बताया कि न्यायिक व्यवस्था के दो हिस्से हैं, एक न्यायपालिका और दूसरा प्रशासन। न्यायपालिका पहले भी सूचना के अधिकार के दायरे में नहीं थी और न अब है, लेकिन उसका प्रशासन अब इसके दायरे में है। यह कानून अब न्यायपालिका के प्रशासनिक अमले में लागू है, जैसा कि मुख्य न्यायाधीश ने स्वीकारा। इस पूरी प्रक्रिया के बाद यह बात एकदम साफ हो गई कि मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय भी प्रशासनिक मकसद से सूचना के अधिकार के अधीन है...।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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