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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 27, 2018 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

माओवादी कार्यकर्ता नंदिनी के खिलाफ जांच पर छत्तीसगढ़ से रिपोर्ट तलब

By Ravindra Pratap SingEdited By:
Published: Tue, 27 Nov 2018 07:38 PM (GMT+05:30)

इस रिपोर्ट में यह भी बताने के लिए कहा गया कि राज्य सरकार सुंदर और अन्य के खिलाफ क्या कदम उठाने जा रही है।

माओवादी कार्यकर्ता नंदिनी के खिलाफ जांच पर छत्तीसगढ़ से रिपोर्ट तलब
माओवादी कार्यकर्ता नंदिनी के खिलाफ जांच पर छत्तीसगढ़ से रिपोर्ट तलब

नई दिल्ली, प्रेट्र। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर और माओवादी कार्यकर्ता नंदिनी सुंदर और अन्य के खिलाफ दर्ज हत्या के मामले में छत्तीसगढ़ सरकार से जांच की स्थिति रिपोर्ट तलब की है। इस रिपोर्ट में यह भी बताने के लिए कहा गया कि राज्य सरकार सुंदर और अन्य के खिलाफ क्या कदम उठाने जा रही है। रिपोर्ट दाखिल करने के लिए शीर्ष कोर्ट ने तीन हफ्ते का समय दिया है।

राज्य के सुकमा जिले के नामा गांव में चार नवंबर, 2015 की रात एक आदिवासी पुरुष शामनाथ बघेल की सशस्त्र नक्सलियों ने धारदार हथियारों से हत्या कर दी थी। बघेल और कुछ अन्य अपने गांव में नक्सली गतिविधियों का विरोध कर रहे थे। इस मामले में पुलिस ने बघेल की पत्नी की शिकायत पर नंदिनी सुंदर, अर्चना प्रसाद (जेएनयू प्रोफेसर), विनीत तिवारी (जोशी अधिकार संस्थान), संजय पराते (छत्तीसगढ़ के माकपा सचिव) और अन्य के खिलाफ हत्या और आपराधिक साजिश का मामला दर्ज किया था।

जस्टिस एमबी लोकुर, एसए अब्दुल नजीर और दीपक गुप्ता की पीठ के समक्ष अपनी याचिका में सुंदर ने एफआइआर से उनका नाम हटाने की मांग करते हुए कहा कि दर्ज मामले में छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले दो साल में कुछ भी नहीं किया है। यहां तक कि पिछले दो साल में उनसे एक बार भी पूछताछ नहीं की गई है। सुंदर की ओर से पेश वकील अशोक देसाई ने कहा कि उनके मुवक्किल को जब भी विदेश जाना होता है तो काफी मुश्किल होती है क्योंकि उन्हें यह बताना होता है कि क्या उनके खिलाफ कोई एफआइआर लंबित है।

छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुंदर की याचिका का विरोध करते हुए कहा कि मामले में प्रगति हुई है और सीआरपीसी की धारा-164 के तहत विभिन्न लोगों के बयान दर्ज किए गए हैं। पीठ ने कहा कि एफआइआर से नाम हटाने का मतलब है कि एफआइआर रद करना और दूसरे पक्ष को सुने बिना एफआइआर रद नहीं की जा सकती। इसके बाद पीठ ने तीन हफ्ते बाद मामला सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया।