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EXCLUSIVE : राम जन्मभूमि अयोध्या में मिले हैं मंदिर होने के सुबूत

मामला सुप्रीम कोर्ट में है, पर हर दल अपने-अपने तर्कों से मुद्दे को हवा देने में लगा है। लेकिन इस सबके बीच, भारत पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) की रिपोर्ट इस मसले पर क्या कहती है इस पर गौर करना महत्वपूर्ण होगा।

By Vikas JangraEdited By: Published: Tue, 13 Nov 2018 08:22 AM (IST)Updated: Tue, 13 Nov 2018 09:39 AM (IST)
EXCLUSIVE : राम जन्मभूमि अयोध्या में मिले हैं मंदिर होने के सुबूत

माला दीक्षित [नई दिल्ली]। अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले एक बार फिर मंदिर मुद्दा गरमाया हुआ है। मामला सुप्रीम कोर्ट में है, पर हर दल अपने-अपने तर्कों से मुद्दे को हवा देने में लगा है। लेकिन इस सबके बीच, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट इस मसले पर क्या कहती है इस पर गौर करना महत्वपूर्ण होगा।

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पंद्रह साल पहले एएसआई ने विवादित स्थल की खुदाई और वैज्ञानिक परीक्षण किया था। खुदाई और वैज्ञानिक परीक्षण पर आधारित रिपोर्ट मं विवादित ढांचे के नीचे पुरातन मंदिर के अवशेष होने का दावा किया गया है। मंदिर के पक्ष में मिले साक्ष्यों को बाकायदा फोटो के साथ एएसआई ने अदालत को सौंपा था। एएसआई ने रिपोर्ट हाईकोर्ट के आदेश पर तैयार की थी और हाइकोर्ट के फैसले के पीछे इस रिपोर्ट की अहम भूमिका मानी जाती है। जाहिर है कि वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित इस रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट भी सिरे से खारिज नहीं कर सकता।

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एएसआई की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि विवादित ढांचे के ठीक नीचे एक बड़ी संरचना मिली है। यहां 10वीं शताब्दी से लेकर ढांचा बनाए जाने तक लगातार निमार्ण हुआ है और खुदाई में जो अवशेष मिले हैं वह ढांचे के नीचे उत्तर भारत के मंदिर होने का संकेत देते हैं। यही नहीं 10वीं शताब्दी के पहले उत्तर वैदिक काल तक की मूतिर्योंं और अन्य वस्तुओं के खंडित अवशेष भी मिले हैं। इनमें शुंग काल की चूना पत्थर की दीवार और कुषाण काल की बढ़ी संरचना भी शामिल है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पक्षकारों के विरोध के बावजूद स्वत: संज्ञान लेकर एक अगस्त 2002 और 23 अक्टूबर 2002 को विवादित स्थल की जमीन के नीचे का जियो रेडियोलाजिकल सर्वे का आदेश दिया था। तोजो विकास इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड ने ये सर्वे किया और 17 फरवरी 2003 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस सर्वे रिपोर्ट में जमीन के अंदर कुछ विसंगतियां पायी गईं थी जिसे देखते हुए हाईकोर्ट ने 5 मार्च 2003 को एएसआई को विवादित स्थल की खुदाई करने का आदेश दिया था।

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एएसआई ने खुदाई करने के बाद 25 अगस्त 2003 को हाईकोर्ट में रिपोर्ट दाखिल की थी। एएसआई की रिपोर्ट के निष्कर्ष में कहा गया है कि हाईकोर्ट ने पूछा था कि क्या विवादित स्थल पर कोई मंदिर या ढांचा था जिसे तोड़ कर मस्जिद का निर्माण कराया गया था। हाईकोर्ट ने एएसआई से विवादित स्थल पर उस जगह खुदाई करने के लिए कहा था जहां जियो रेडियोलोजिकल सर्वे में विसंगतियां पायी गई थी, जो कि ढांचा, खंबे, नीव की दीवारें, स्लैब, फर्श आदि हो सकती है।’

एएसआई रिपोर्ट में कहा गया है कि विवादित ढांचे के नीचे मिली विशाल संरचना में नक्काशीदार ईंटें, देवताओं की युगल खंडित मूर्तियां और नक्काशीदार वास्तुशिल्प, पत्तों के गुच्छे, अमालका, कपोतपाली, दरवाजों के हिस्से, कमल की आकृति, गोलाकार (श्राइन) पूजा स्थल जैसी चीजें मिली हैं जिसमें उत्तर की ओर निकला एक परनाला भी है, (इसे भगवान शिव के मंदिर से जोड़ कर देखा जा रहा है)। उस बड़े ढांचे में पचास खंबों का आधार मिला है। ये अवशेष उत्तर भारत के मंदिरों की खासियत से मेंल खाते हैं’।

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एएसआई की रिपोर्ट का यह निष्कर्ष 1993 में राष्ट्रपति द्वारा रिफरेंस भेजकर सुप्रीम कोर्ट से पूछे गए सवाल का जवाब भी देता है। तत्कालीन राष्ट्रपति ने पूछा था कि क्या अयोध्या में विवादित ढांचे से पहले वहां हिंदू मंदिर या हिंदू धार्मिक स्थल था। सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने इन सवाल को बेकार और अनावश्यक बताते हुए बगैर जवाब दिये वापस कर दिया था। पांच में से दो न्यायाधीशों ने अलग से दिए फैसले में रिफरेंस वापस करते हुए यह भी कहा था कि ऐसा नहीं है कि कोर्ट इस सवाल का जवाब देने में सक्षम नहीं है। इसका जवाब दिया जा सकता है अगर इस बारे में पुरातत्व और इतिहासकारों के विशेषज्ञ साक्ष्य हो और उन्हें जिरह में परखा जाए तो।’ अब वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध है।

गोलाकार पूजा स्थल
रिपोर्ट के इसी चैप्टर चार में एक खंड, सर्कुलर श्राइन यानी गोलाकार पूजा स्थल का दिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक खुदाई में थोड़ा बहुत क्षतिग्रस्त पूर्व की ओर मुख वाला ईटों का बना गोलाकार पूजा स्थल का ढांचा मिला है। इस गोलाकार ढांचे का पूर्वी सिरा वर्गाकार है। इसका एक हिस्सा अंग्रेजी के अक्षर वी के आकार का है जो कि टूटा हुआ था और जिसमें जल बाहर निकालने के लिए उत्तर की ओर एक परनाला जैसी संरक्षना थी, जो कि स्वाभाविक तौर पर डेटी (मूर्ति) के अभिषेक के लिए बनाई गई थी लेकिन मूति वहां मौजूद नहीं थी।

गुप्त और कुषाण काल के अवशेष मिले
गुप्त और उत्तर गुप्त काल और कुषाण काल के अवशेष भी मिले हैं। यहां पर गुप्त कालीन और कुषाण कालीन दीवारें मिली हैं। कुषाण कालीन निमार्ण कोई साधारण इमारत नहीं थी बल्कि एक विशाल संरचना थी। यही नहीं यहां चूना पत्थर की दीवार मिली जो शुंगकाल की मानी जाती है। ट्रेंच 8 की लेयर सात से लिए गए चारकोल के नमूनों का कालखंड वर्ष 90 से 340 के बीच का पाया गया है।


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