नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। एक तो पानी है नहीं, थोड़ी मात्रा में जो पानी बचा है वो प्रदूषित है। चूंकि पानी की उपलब्धता कम हो चुकी है, लिहाजा उसमें प्रदूषण की सांद्रता बढ़ गई है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि एक गिलास पानी में एक मुट्ठी नमक डालने और एक बाल्टी पानी में इतनी ही मात्रा में नमक डालने का जो अंतर है, वही कम मात्रा में धरती पर उपलब्ध पानी के साथ हो रहा है।

अभाव से आया दुष्प्रभाव

1951 में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 5177 घनमी थी, 2011 में घटकर 1545 घनमी हो चुकी है। यानी पिछले साठ साल में प्रति इसमें 70 फीसद की गिरावट आ चुकी है। अगर यह 1700 घनमी से कम रह जाती है तो अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से उस क्षेत्र को वाटर स्ट्रेस्ड माना जाता है। भारत जल वंचित श्रेणी की तरफ तेजी के साथ बढ़ रहा है। यह उस दशा को कहते हैं जब उपलब्धता एक हजार घनमी से कम रह जाती है 

भयावह भविष्य

2001 में देश की औसत सालाना प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1820 घनमी थी। सरकार का आकलन है कि 2025 तक यह 1341 घनमीटर रह सकती है। स्थिति तो तब विकट होगी जब इसी अनुमान के मुताबिक 2050 तक इसकी मात्रा 1140 घनमी रह जाएगी।

बारिश का दुरुपयोग

केंद्रीय जल आयोग के अनुसार भारत की सालाना जल जरूरत 3000 अरब घनमी है। सालाना औसतन 4000 अरब घनमी की बारिश होती है। 130 करोड़ लोग इन अनमोल बूंदों के तीन चौथाई हिस्से का भी सदुपयोग नहीं कर पाते हैं। जिसके चलते यह हर साल बर्बाद हो जाता है। एकीकृत जल संसाधन विकास पर गठित राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट बताती है कि सालाना लोगों द्वारा बारिश के कुल 1123 अरब घनमी पानी का ही इस्तेमाल हो पाता है। इसमें 690 अरब घनमी सतह पर मौजूद जल है और 433 अरब घनमी जल रिसकर भूजल में मिलता है। बाकी सब व्यर्थ चला जाता है। इस बर्बाद होनेाले पानी को बचाकर हम पानीदार बन सकते हैं।

भूजल का हाल

पेयजल के लिए सर्वाधिक इसी का इस्तेमाल होता है, लेकिन देश की कुल सिंचाई का 80 फीसद धरती की कोख को सुखाकर की जा रही है। ज्यादातर किसानों और उद्योगों द्वारा इसका दुरुपयोग किया जा रहा है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार इन दोनों मदों में देश के कुल भूजल का 12 फीसद हिस्सा खर्च किया जा रहा है। 

घरेलू बर्बादी और दोबारा उपयोग नहीं

हमारे घरों में इस्तेमाल होने वाला 80 फीसद पानी बर्बाद हो जाता है। अधिकांश मामलों में इस पानी को साफ करके दूसरे या कृषि में इस्तेमाल नहीं हो पाता है। इजरायल और ऑस्ट्रेलिया में ऐसा नहीं है। इजरायल अपने शत-प्रतिशत इस्तेमाल पानी का शुद्धीकरण करता है और घर में इस्तेमाल होने वाले पानी के 94 फीसद को रिसाइकिल किया जाता है।

भूजल और पेयजल

भारत जितना भूजल दोहन करता है उसका सिर्फ आठ फीसद ही पेयजल के रूप में इस्तेमाल करता है। भारत का अधिकांश भूजल गुणात्मक रूप से अभी पीने लायक है जबकि अन्य स्नोतों का पानी प्रदूषित हो चुका है। समस्या इसलिए जटिल हो रही है क्योंकि देश की सिंचाईं प्रणाली की कुशलता निम्न स्तर की है। सिंचाई के लिए इस्तेमाल पानी का करीब 60 फीसद बर्बाद हो जाता है।

उद्योगों की जरूरत

ज्यादातर उद्योगों ने भूजल निकालने के लिए खुद के बोरवेल लगा रखे हैं। वल्र्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार 2013 से 2016 के बीच 14 से 20 थर्मल पावर प्लांट को पानी की किल्लत के चलते अपना काम बंद करना पड़ा था। उद्योगों को भी पानी इस्तेमाल के विकल्पों को तलाशना होगा, अथवा जितना पानी साल भर इस्तेमाल करते हैं उतनी मात्रा का धरती में पुनर्भरण करना पड़ेगा तभी समस्या से निजात मिल सकती है।

गिरता भूजल स्तर

भूजल स्तर 0.3 मीटर सालाना की दर से गिर रहा है। 2002 से 2008 के बीच भारत ने 109 घन किमी भूजल का इस्तेमाल किया है। यह देश के सबसे बड़े सरफेस जलाशय अपर वैनगंगा की क्षमता से दोगुना है। सिंचाईं के लिए अन्य स्नोतों का इस्तेमाल बढ़ाकर भूजल के दबाव को कम किए जाने की जरूरत है।

बोतलबंद पानी

ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड से पंजीकृत 6000 कंपनियां देश में बोतलबंद पानी के कारोबार से जुड़ी हुई हैं। औसतन हर घंटे एक कंपनी पांच हजार लीटर से 20 हजार लीटर तक पानी धरती से निकाल रही है। 15 फीसद की दर से बढ़ रहे इस उद्योग से पानी इस्तेमाल में बर्बादी की दर करीब 35 फीसद है।

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Posted By: Kamal Verma

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