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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 14, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की दलील- हिजाब फर्ज है, अदालतें इसकी अनिवार्यता निर्धारित करने में सक्षम नहीं

By Krishna Bihari SinghEdited By:
Published: Wed, 14 Sep 2022 07:05 PM (IST)Updated: Wed, 14 Sep 2022 07:33 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को भी हिजाब मामले में सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि धार्मिक पुस्तक के ...और पढ़ें

हिजाब मामले में बुधवार को भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई।
हिजाब मामले में बुधवार को भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई।

नई दिल्ली, आइएएनएस। सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को याचिकाकर्ताओं ने कहा कि धार्मिक पुस्तक के अनुसार हिजाब पहनना फर्ज यानी कर्तव्य है और अदालतें इसकी अनिवार्यता निर्धारित करने में सक्षम नहीं हैं। कर्नाटक में स्कूलों में हिजाब पहनने पर रोक के मामले में शीर्ष अदालत में सुनवाई चल रही है। राज्य सरकार के रोक के फैसले को कर्नाटक हाई कोर्ट ने बरकरार रखा था, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

राजीव धवन ने दी दलीलें

जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ के समक्ष कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने बिजो इमैनुअल मामले में शीर्ष अदालत के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि एक बार जब यह दर्शाया गया कि हिजाब पहनना एक वास्तविक प्रथा है तो इसकी अनुमति थी।

विवाद पैदा होता है तो कौन फैसला करेगा?

धवन ने कहा कि कर्नाटक हाई कोर्ट का यह निष्कर्ष निकालना हैरान करने वाला है कि चूंकि हिजाब नहीं पहनने पर किसी तरह के दंड का प्रविधान नहीं है, इसलिए यह अनिवार्य नहीं है। इस पर पीठ ने धवन से सवाल किया कि क्या उनकी दलील है कि अदालतें इस मामले का निपटारा करने में सक्षम नहीं, और अगर कोई विवाद पैदा होता है तो कौन सा मंच इसका फैसला करेगा?

हिजाब एक अनिवार्य प्रथा

धवन ने कहा, विवाद क्या था? क्या हिजाब एक अनिवार्य प्रथा थी? उन्होंने कहा कि हिजाब पूरे देश में पहना जाता है और जब तक यह वास्तविक और प्रचलित है, इस प्रथा की अनुमति दी जानी चाहिए और धार्मिक पुस्तक का उल्लेख किए जाने की कोई आवश्यकता नहीं थी।

धार्मिक संदर्भ ढूंढने की जरूरत नहीं

धवन ने तर्क दिया कि आस्था के सिद्धांतों के अनुसार, अगर किसी चीज का पालन किया जाता है तो इसका मतलब है कि उसकी अनुमति थी और यह वास्तविक है तो उसके लिए धार्मिक संदर्भ को ढूंढने की कोई जरूरत ही नहीं है। अगर किसी समुदाय का विश्वास साबित हो जाता है तो जज उसे स्वीकार करने के लिए बाध्य होता है, न कि उस पर फैसला करता है।

फर्ज बताने के पीछे आधार क्या है?

धवन ने केरल हाई कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि कुरान के आदेशों और हदीसों के विश्लेषण से पता चलता है कि सिर ढंकना एक फर्ज है। पीठ ने पूछा कि इसे फर्ज बताने के पीछे आधार क्या है? जस्टिस गुप्ता ने धवन से कहा, 'आप चाहते हैं कि हम वह न करें जो केरल हाई कोर्ट ने किया है?' धवन ने अपनी दलीलें खत्म करते हुए कहा कि सरकार के आदेश के पीछे कोई आधार नहीं है और यह अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करता है और जिसकी संविधान अनुमति नहीं देता। मामले में सुनवाई अभी जारी रहेगी। 

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