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    नव भारत संकल्प से सिद्धि तक, 2026...आशाओं से सजा साल

    Updated: Sat, 03 Jan 2026 05:36 PM (IST)

    भारत जापान को पीछे छोड़कर विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है, जिसका लक्ष्य 2030 तक 7.3 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी है। इन्फ्रास्ट्रक्चर, विनिर्मा ...और पढ़ें

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    सफलता की सीढ़ियां चढ़ता नया भारत।

    महेश शुक्ल, नई दिल्ली। नए वैश्विक बाजारों से लेकर गांव-कस्बों की दुकानों तक भारतीय अर्थव्यवस्था एक ऑलराउंडर की तरह खेल रही है। आर्थिक रणनीतियां आकार ले रही हैं, परिणाम की आशा बांध रही हैं। धरातल पर प्रभाव दिख रहा है। इसका एक सुस्पष्ट प्रमाण 2025 जाते-जाते दे गया, जब समाचार पत्रों की सुर्खियों ने बताया कि जापान को पीछे छोड़कर भारत अब विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है।

    अब हम 4.18 ट्रिलियन डालर जीडीपी वाला देश हैं। 2030 तक 7.3 ट्रिलियन डालर वाली जीडीपी तक पहुंचने का अनुमान भी है। 2014 में हमारी जीडीपी करीब दो ट्रिलियन डालर थी। बीते 11 वर्ष में 100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हो चुकी है। इसी बीच इन्फ्रा को मजबूत करने पर काम होता रहा है, जो काफी हद तक पूरा हो चुका है। स्वाभाविक है कि आर्थिक वृद्धि दर अगले कुछ वर्षों में इन्फ्रा, लाजिस्टिक, मैन्यूफैक्चरिंग, निर्यात के नए बाजारों, घरेलू खपत, कृषि और खाद्य पदार्थ उत्पादन-प्रसंस्करण व सर्विस सेक्टर के एक्सप्रेसवे पर जब गति-शक्ति से दौड़ेगी तो 2047 का स्वप्न साकार होने में शायद ही कोई संदेह रहे।

    रेटिंग एजेंसी मूडीज उक्त कथ्य को तथ्यात्मक व आंकड़ों के रूप में प्रमाणित करती भी दिख रही है। इसके अनुसार आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक वृद्धि दर जी20 देशों में सबसे तेज रहने वाली है। 2026 में 6.4 और 2027 में 6.5, कुछ यही भाव आइएमएफ और आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) के अनुमानों का भी है।

    दुनिया भर से हो रही दोस्ती

    आंकड़ों की बात तो हो गई। अब जरा आर्थिक मोर्चे पर देश की रणनीति की चर्चा भी कर ली जाए। प्रसिद्ध निवेशक वारेन बफे 2025 के आखिरी दिन रिटायर हो गए, लेकिन भारत की ताजा आर्थिक रणनीति के संदर्भ में उनका एक कोट बड़ा प्रासंगिक लगता है- ‘डू नाट पुट आल एग्स इन वन बास्केट...’ यह कोट यूं तो निवेशकों के लिए है कि अपना धन एक ही कंपनी में न लगाकर विभिन्न क्षेत्रों में निवेश करें, लेकिन भारत की हालिया तैयारी देखकर लग रहा है कि वह भी इसी तरह काम कर रहा है।

    ऑस्ट्रेलिया से हमारा व्यापार समझौता हो चुका है। बड़ा बाजार है, विविधता भरा बाजार है। न्यूजीलैंड से भी इस मोर्चे पर बात बन चुकी है यानी ओसेनिया में हम गहरे पहुंच रहे हैं। अब जरा दुनिया के दूसरे हिस्से मिडिल ईस्ट यानी खाड़ी क्षेत्र की तरफ देखें तो वहां भी एक समझौता बीते साल ओमान के साथ हुआ है। खाड़ी देशों से अब तक हमारा व्यापारिक नाता मुख्य रूप से तेल का ही रहा है, लेकिन अब खेल का रूप बदल रहा है।

    ओमान का समझौता इससे आगे जाकर सप्लाई चेन का मजबूत हिस्सा बनने में मदद कर सकता है। लैटिन अमेरिका से भी तस्वीर बदल रही है। अर्जेंटीना और ब्राजील दो प्रमुख देश हैं इस क्षेत्र के। वहां से व्यापार बढ़ रहा है। लीथियम, हाइड्रोकार्बन और रिन्यूएबल एनर्जी के लिए लैटिन अमेरिकी देश बेहद अहम हैं। हमारी कंपनियां भी वहां विस्तार पा रही हैं।

    यूनाइटेड किंगडम के साथ व्यापार समझौता अहम होगा। लंबा समय लगा इसमें, आखिरकार बात बनी। अफ्रीका भी अछूता नहीं है। पुराने व्यापारिक रिश्तों को नई धार मिल रही है। 100 करोड़ डालर के पार है वहां से व्यापार। भारत अफ्रीकी देशों के लिए तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।

    बाकी एशियाई देशों के साथ तो हमारे आर्थिक-व्यापारिक रिश्ते हैं ही। अमेरिका के साथ कुछ खटास टैरिफ के कारण आई है, लेकिन पूरी उम्मीद है कि नए वर्ष में उसके साथ भी व्यापार समझौते पर बात बन जाएगी। कुल मिलाकर ग्लोबल इकोनोमिक एप्रोच सही मायने में चरितार्थ होने का आधार बनती दिख रही है।

    भारत की ओर सबकी नजर

    विदेश से अब देश पर आते हैं। आर्थिकी का बड़ा पहलू देश के भीतर ही होता है। भारत ने मैन्यूफैक्चरिंग में अपनी स्थिति मजबूत करने की योजना बनाई है। मेक इन इंडिया और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीआईएल) मैन्यूफैक्चरिंग का पसंदीदा स्थान बनने की दिशा में बड़ा कदम रहा है। इस वर्ष और इस पर कदम बढ़ने की पूरी उम्मीद है।

    देश में आईफोन का विनिर्माण इसी तरफ संकेत कर रहा है। संकेत मिल रहे हैं कि दक्षिण कोरियाई कंपनियां भी भारत का रुख करने पर विचार कर रही हैं। इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का निर्माण एक बड़ा क्षेत्र है, जहां से हमारी आर्थिकी को बल मिल सकता है। हालांकि अभी इसके लिए काफी कुछ किया जाना है ताकि मैन्यूफैक्चरिंग हब का संदेश सही मायने में दुनिया को समझाया जा सके। असेंबलिंग भर से काम नहीं चलने वाला, उत्पादन पर भी काम करना होगा। सरकार का ध्यान इसी पर है।

    आंकड़े देखें और समझें

    वर्ष 2014 में देश में मोबाइल उत्पादन की दो इकाइयां थीं, अब 300 से अधिक हैं। पहले हम लोकल मोबाइल उत्पादन करते थे, अब 99 प्रतिशत से अधिक दुनिया के दूसरे सबसे बड़े मोबाइल उत्पादक देश बन चुके हैं। अमेरिका को सबसे अधिक मोबाइल हम निर्यात करते हैं। बैटरी, चार्जर और डिस्प्ले निर्माण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। सेमीकंडक्टर हम सुना करते थे, अब बनाने की तैयारी में हैं। फाक्सकान से बात हो चुकी है, भारत में उत्पादन आरंभ होना है। अन्य कंपनियां भी आएंगी। चिप निर्माण हमें एक अलग स्तर पर ले जा सकता है।

    नए रूप-स्वरूप में कृषि

    भारत को गांवों और किसानों का देश कहा जाता है, लेकिन अब छवि दूसरी बन रही है। बाजार को किसानों के खेत तक पहुंचाने की कोशिश है। फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी यानी एफपीओ गांवों में अब जाना-पहचाना शब्द है। परंपरागत फसलों से आगे बढ़कर कैश क्राप्स पर ध्यान है। फल और सब्जियों के उत्पादन में भारत विश्व में दूसरे स्थान पर है, लेकिन दुखद यह कि करीब 40 प्रतिशत उत्पाद खराब हो जाते हैं क्योंकि स्टोरेज और प्रसंस्करण के सही विकल्प नहीं हैं।

    करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपये वार्षिक का नुकसान है यह, जो जीडीपी पर सीधा असर डालता है। इसे कम करने के उपाय हो रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश हो या पूरब के खेत, पोर्टेबल कोल्ड स्टोरेज से लेकर आधुनिक प्रसंस्करण इकाइयां आपको पहले से अधिक दिखेंगी। पीएम किसान संपदा योजना प्रसंस्करण का बुनियादी ढांचा मजबूत करने के लिए है तो एग्री इन्फ्रा फंड उन उद्यमियों को दीर्घावधि का ऋण देने के लिए है, जो इस क्षेत्र में काम करना चाहते हैं।

    कदम बढ़ रहे हैं, 2026 में मजबूती की आशा है। एफपीओ और जैविक उत्पादन से किसान खुद के लिए बाजार खोज रहे हैं। बड़े शहरों के पास के गांवों के किसान इसका लाभ ले रहे हैं। उनका अपना उपभोक्ता वर्ग बन रहा है।

    सहकारिता और ग्रामीण आर्थिकी

    गांव की अर्थव्यवस्था का एक पहलू और भी है- महिला सशक्तीकरण। आजीविका समूह, स्वयं सहायता समूह इस दिशा में कारगर साबित हो रहे हैं, खासकर सीमांत किसानों और मजदूर वर्ग की महिलाओं के लिए। सात-आठ हजार से लेकर 15,000 रुपये प्रतिमाह तक की आय से ग्रामीण घरों की आर्थिकी बदल रही है।

    बीते कुछ वर्ष में देश में सहकारिता को संजीवनी सी मिली है। पैक्स यानी प्राथमिक कृषि साख समितियों को फिर से सशक्त करने पर तेजी से काम हुआ है। ये समितियां कृषकों और ग्रामीणों को ऋण देने के साथ अन्य सेवाएं भी देती हैं।

    नई राष्ट्रीय सहकारिता नीति बनी है, जिसका उद्देश्य सहकारी समितियों के माध्यम से जीडीपी में इस क्षेत्र के योगदान को तीन गुणा करना है। डेयरी और कृषि क्षेत्रों के साथ ही अब भारत टैक्सी, सहकारी बीमा, पर्यटन और हरित ऊर्जा के क्षेत्रों में भी सहकारिता के भाव को प्रमुखता दी जा रही है।

    ज्ञान-विज्ञान और आर्थिकी

    2025 में भारतीय विज्ञान ने नया गगन छुआ जब शुभांशु शुक्ला अंतरिक्ष में पहुंचे। राकेश शर्मा के बाद केवल दूसरे भारतीय। यह इसरो की एक और छलांग है। मंगलयान और चंद्रयान-3 के बाद। अब गगनयान की बारी है यानी अपने यान से मानव को चंद्रमा पर भेजना। यह केवल विज्ञान भर नहीं है, वैश्विक आर्थिकी का भी एक अहम पहलू है।

    पिछले दिनों इसरो के बाहुबली ने दुनिया के सबसे भारी सेटेलाइट को अंतरिक्ष में पहुंचाया। यह राकेट अमेरिका का था। इन-स्पेस और न्यू इंडिया स्पेस लिमिटेड अंतरिक्ष क्षेत्र को कमर्शियल बनाने पर काम कर रहे हैं। इसरो की भूमिका भी विस्तारित हो रही है। कभी श्रीहरिकोटा में साइकिल से राकेट के पार्ट ले जाने वाले इसरो के विज्ञानी अब आरएंडडी पर केंद्रित हो गए हैं क्योंकि दो वर्ष पहले बनी नई अंतरिक्ष नीति कुछ यही कहती है। निजी कंपनियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

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