स्कन्द विवेक धर, नई दिल्ली। भारतीय शेयर बाजार का सबसे पुराना संवेदी सूचकांक सेंसेक्स 13 महीनों के बाद नई ऊंचाई पर है। मंगलवार को सेंसेक्स 62681 पर बंद हुआ। पिछले साल अक्टूबर में इसने 62,245 का रिकॉर्ड बनाया था। हालांकि, इन दोनों रिकॉर्ड ऊंचाईयों में एक आधारभूत अंतर है। पिछले साल की ऊंचाई बाजार ने विदेशी निवेशकों यानी एफपीआई के जरिए हासिल की थी, जबकि ताजा ऊंचाई एफपीआई की बेरुखी के बीच घरेलू निवेशकों के सहारे हासिल हुई है। विशेषज्ञ इसे घरेलू बाजार का आत्मनिर्भर होना भी मान रहे हैं।

बीते साल विदेशी निवेशकों के दम पर भारतीय बाजार नित नई ऊंचाई छू रहा था। एक जनवरी 2021 को सेंसेक्स 47,785 के स्तर पर था, जो 19 अक्टूबर को 62,245 के नए रिकॉर्ड पर पहुंच गया। लेकिन इसके बाद वैश्विक कारणों से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालने लगे। अगले नौ महीनों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से 2.55 लाख करोड़ रुपए निकाल लिए। यह कुल एफपीआई निवेश के पांचवे हिस्से से भी अधिक है।

सामान्य स्थिति में इतनी भारी बिकवाली के चलते भारतीय बाजार को क्रैश हो जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। भारतीय बाजार में परिपक्व हो रहे रिटेल निवेशकों और घरेलू संस्थागत निवेशकों खासकर म्यूचुअल फंड्स ने लगातार निवेश कर भारतीय बाजार को क्रैश होने से बचा लिया।

जिन नौ महीनों (अक्टूबर 2021 से जून 2022) में एफपीआई ने 2.55 लाख करोड़ रुपए निकाले थे, उन्हीं नौ महीनों में भारतीय निवेशकों ने म्यूचुअल फंड के जरिए शेयर बाजार में 1.55 लाख करोड़ का निवेश कर दिया। बीमा कंपनियों, रिटेल निवेशकों, ईपीएफओ और बैंकों का निवेश इससे अलग है। इसके चलते बाजार में बमुश्किल 8-9% की गिरावट आई। नौ महीने बाद जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार में लौटे तो बाजार नई ऊंचाइयां छूने लगा।

मोतीलाल ओसवाल एसेट मैनेजमेंट कंपनी के चीफ बिजनेस ऑफिसर अखिल चतुर्वेदी कहते हैं, आज खुदरा निवेशकों की बचत का बड़ा हिस्सा इक्विटी में जा रहा है। ऐसा होने की दो प्रमुख वजहें हैं। घरेलू निवेशक पहले रियल एस्टेट और सोने में निवेश पसंद करते थे, लेकिन नोटबंदी, रेरा, पैन रिपोर्टिंग के चलते इसमें रुझान कम हो रहा है। यह पैसा इक्विटी में आ रहा है। दूसरा, परंपरागत रूप से भारतीय परिवार निश्चित कूपन वाले निवेश को प्राथमिकता देते थे। लेकिन कोविड के दौर में ब्याज दरें गिरने के बाद इक्विटी एसआईपी की स्वीकार्यता तेजी से बढ़ी है। एसआईपी अब ज्यादातर निवेशकों के लिए उनकी लंबी अवधि की निवेश जरूरतों के लिए बचत का एक डिफ़ॉल्ट तरीका बन गया है, जो बाजार को मजबूती प्रदान कर रहा है।

आनंद राठी शेयर्स एंड स्टॉक ब्रोकर्स के इक्विटी रिसर्च (फंडामेंटल) प्रमुख नरेंद्र सोलंकी भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत स्थिति को भी निवेशकों के बढ़ते विश्वास की वजह मानते हैं। सोलंकी कहते हैं, केंद्रीय बैंक और केंद्र सरकार के नीति निर्माताओं ने अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में अपनी क्षमता साबित की है। बेहतर जीएसटी संग्रह, जीडीपी की उच्च विकास दर, सामान्य से बेहतर मानसून और मजबूत कमाई जैसे कारक हैं, जो अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था को बेहतर स्थिति में रखेंगे। यही कारण है कि घरेलू निवेशक भारतीय बाजार पर दांव लगा रहे हैं।

खत्म हुआ एफपीआई का “खेल”

अब से पहले विदेशी निवेशकों की ओर से की गई बड़ी बिकवाली से बाजार क्रैश कर जाते थे और ये विदेशी निवेशक निचले स्तर पर खरीदारी कर अच्छा मुनाफा कूट लेते थे। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ है। मोतीलाल ओसवाल एएमसी के चीफ बिजनेस ऑफिसर अखिल चतुर्वेदी ने जागरण प्राइम से कहा कि पहले अगर एफपीआई सतत बिकवाली शुरू करते थे, तो बाजार बुरी तरह टूट जाते थे क्योंकि उनकी बराबरी में खरीदारी करने वाला कोई नहीं होता था। अब ऐसा नहीं है। घरेलू संस्थागत निवेशक (DII) और खुदरा निवेशक अब एक ताकत हैं। यह काउंटर बैलेंसिंग फैक्टर एफपीआई की बिकवाली के बावजूद बाजारों को स्थिर रखने में मदद करता है।

भारतीय बाजार में एफपीआई का दबदबा कैसे कम हो रहा है, इसे इस आंकड़े से भी समझा जा सकता है। जून 2017 से जून 2022 तक एनएसई-500 के स्वामित्व में 2.8% हिस्सेदारी एफपीआई से प्रमोटरों/डीआईआई/रिटेल निवेशकों की ओर शिफ्ट हुई है, जिसकी वैल्यू करीब 7.4 लाख करोड़ रुपए है।

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