नई दिल्ली, स्कन्द विवेक धर। ओवर दि टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म ने हमारे घरों में तेजी से अपनी जगह तो बना ली है, लेकिन अपनी जिम्मेदारियों से ये अब तक मुंह मोड़े बैठे हैं। इंटरनेट की आजादी के बहाने ये प्लेटफॉर्म समाज की भलाई के लिए बने भारतीय कानूनों को अंगूठा दिखा रहे हैं। सेंसर बोर्ड के दायरे से बाहर होने का फायदा उठाते हुए ये अत्यधिक हिंसा और अश्लीलता तो परोस ही रहे हैं, साथ ही ड्रग्स और धूम्रपान के दृश्यों के नियमन को लेकर बने केंद्रीय कानूनों की भी धज्जियां उड़ा रहे हैं।

यह इस लिहाज से गंभीर है कि बीते कुछ वर्षों में देश में ऑन डिमांड स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म का चलन तेजी बढ़ा है। देश में डिजिटल वीडियो देखने वालों की संख्या फिलहाल 36 करोड़ से अधिक है, पांच साल पहले यह संख्या लगभग आधी यानी 17 करोड़ थी। ओटीटी सब्सक्राइबर की संख्या 10 करोड़ के करीब पहुंच चुकी है। इनमें युवा अधिक हैं। अहमदाबाद स्थित माइका इंस्टीट्यूट के एक अध्ययन के मुताबिक, ओटीटी देखने वाले दर्शक समूहों में दो तिहाई से अधिक हिस्सेदारी 15 से 34 साल की उम्र के लोगों की है।

नया संचार माध्यम होने के चलते पहले से बने भारतीय कानूनों में ओटीटी का जिक्र नहीं है। इसी का ये प्लेटफॉर्म फायदा उठा रहे हैं। इन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों में हिंसा, नशा और अपराध के दृश्यों की भरमार तो है ही, इनमें किसी प्रकार का डिस्क्लेमर भी नहीं दिया जा रहा है। युवाओं को धड़ल्ले से नशा करते हुए दिखाया जाता है।

अध्ययन बताते हैं कि ओटीटी का कंटेंट हमारे युवाओं पर मनोसामाजिक प्रभाव डाल रहा है। जे.सी. बोस यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के एक अध्ययन के मुताबिक, वेब सीरीज और ऑनलाइन स्ट्रीमिंग कंटेंट युवाओं के मानस को प्रभावित करते हैं। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री हिंसा, यौन और दुर्व्यवहार से भरी हुई है और यह भारतीय युवाओं पर प्रभाव डाल रही है। इससे उनके जीवन में क्रोध, आक्रामकता, चिंता और अवसाद के मामले बढ़ रहे हैं। यदि यह अनियंत्रित रहा तो युवाओं में बड़ी मनोसामाजिक समस्याएं पैदा करेगा।

उपरोक्त उदाहरण में दी गईं ये खबरें यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि वेब सीरीज का कंटेंट किस तरह हमारे बच्चों और नौजवानों को प्रभावित कर रहा है।

कानून के जानकार ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के इस रवैये को कानून ही नहीं, संविधान के भी खिलाफ मान रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता कहते हैं, कोटपा कानून के दायरे में फिल्म, टीवी और विज्ञापन आदि सभी आते हैं। इसमें ओटीटी के लिए कोई छूट का प्रावधान नहीं है। कुछ लोग अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर ओटीटी को कोटपा जैसे कानून के दायरे से बाहर रखने की बात करते हैं, लेकिन संविधान के अनुच्छेद-19(2) के तहत अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी कानून का उल्लघंन नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी दुबे कहते हैं, यह बहुत ही महत्वपूर्ण और गंभीर विषय है। सुप्रीम कोर्ट में ओटीटी के विनियमन को लेकर बहुत से मामले हैं। ओटीटी क्रान्ति के कारण अब सभी वर्ग के लोग हर तरह के चलचित्र का बिना किसी रोक-टोक के आनंद ले रहे हैं। किंतु यही माध्यम अब समाज में गलत अवधारणा भी फैला रहा है।

गुप्ता के मुताबिक, केन्द्र सरकार ने ओटीटी और डिजिटल मीडिया के लिए पिछले साल जो एथिक्स कोड बनाये उसमें दर्शकों की उम्र के अनुसार वर्गीकरण की बात कही गई है। कानून का समान रूप से पालन नहीं होने पर फिल्मों और ओटीटी के दो अलग वर्ग बन जाते हैं, जो संविधान के अनुच्छेद-14 के खिलाफ है।

गुप्ता कहते हैं, केन्द्र सरकार ने ट्रांजैक्शन ऑफ बिजनेस रूल्स में बदलाव करके ओटीटी और डिजिटल मीडिया को केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्रालय के दायरे में लाने के आदेश बहुत पहले जारी किए थे। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ही फिल्मों में सेंसर बोर्ड का नियामक है। अगर ओटीटी प्लेटफॉर्म स्वैच्छिक तौर पर कानूनों का पालन करने में विफल रहते हैं, तो सरकार को लोकहित में इन कानूनों का पालन सुनिश्चित कराने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।

एडवोकेट अश्विनी दुबे भी इस बात से इत्तेफाक रखते हुए कहते हैं, केंद्र सरकार ने लोगों की मांग और सुप्रीम कोर्ट के नोटिस पर ‘एथिक्स कोड 2021’ तो बना दिया है, लेकिन अभी बहुत कुछ करना शेष है, ताकि इस अत्यधिक महत्वपूर्ण माध्यम को दिशाभ्रमित होने और उसके दुरुपयोग से रोका जा सके।

Edited By: Skand Vivek Dhar

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