नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। नासा का Lunar Reconnaissance Orbiter  (LRO) या lunar Craft  चांद की सतह पर मौजूद लैंडर विक्रम की खोज करेगा। इसके लिए वह उसी रास्‍ते से गुजरेगा जिस रास्‍ते पर विक्रम चांद की सतह पर मौजूद है। इस दौरान वह विक्रम की इमेज भी लेगा। नासा इस सर्च अभियान से जुड़ी हर खबर को न सिर्फ ISRO बल्कि सभी के साथ साझा भी करेगा। आपको बता दें कि ल्‍यूनारक्राफ्ट वर्ष 2009 से ही चांद के चक्‍कर लगा रहा है। आमतौर पर यह चांद की सतह से करीब सौ किमी की ऊंचाई पर इसकी परिक्रमा करता है, लेकिन, विक्रम की जानकारी लेने और उसकी इमेज क्लिक करने के लिए यह अपनी ऊंचाई को घटाकर 90 किमी करेगा। गौरतलब है कि भारत का ऑर्बिटर अब भी चांद के चक्‍कर लगा रहा है। 7 सितंबर को पहली बार इसरो ने इसके द्वारा विक्रम की पॉजीशन का पता लगाने और इसकी इमेज खींचने की जानकारी दी थी। हालांकि इसरो ने इसकी अब तक भी कोई इमेज रिलीज नहीं की है। 

सर्च अभियान के लिए खास है ल्‍यूनार क्राफ्ट 

नासा ने एक खास वजह से इस को विक्रम की खोज के लिए चुना है। आपको बता दें कि ल्‍यूनार क्राफ्ट के साथ कई उपलब्धियां जुड़ी हुई हैं। इसमें लगे कैमरे अन्‍य ऑर्बिटर्स के मुकाबले कहीं ज्‍यादा बेहतर हैं। ल्‍यूनार क्राफ्ट ने अब तक अपोलो 11,12 14, और17 की लैंडिंग वाली जगहों की पहले से अधिक साफ इमेज मुहैया करवाई हैं। इसके अलावा इसने ही इजरायल के स्‍मॉल रोबोटिक लैंडर बेयरशीट (Israel small robotic lunar lander Beresheet) की जानकारी पहली बार उपलब्‍ध करवाई थी और इसकी लैंडिंग वाली जगह के बारे में बताया था।इसकी तस्‍वीर को खींचने के लिए ल्‍यूनार क्राफ्ट 90 किमी की ऊंचाई से इस पर से गुजरा था। बेयरशीट को इसी वर्ष फरवरी में लॉन्‍च किया था। लेकिन यह चांद पर सफलतापूर्वक नहीं उतर सका था और चांद की सतह पर हुई हार्ड लैंडिंग की वजह से अपने मिशन में नाकामयाब हो गया था। नासा के एस्‍ट्रॉनॉट्स के मुताबिक ल्‍यूनार क्राफ्ट (Nasa lunarcraft) यदि अपने इस मिशन में कामयाब हो गया तो यह भी काफी बड़ी उपलब्धि होगी।

Lunar Reconnaissance Orbiter

आपको बता दें कि LRO एक रोबोटिक स्‍पेसक्राफ्ट है जो भविष्‍य में चांद पर भेजे जाने वाले रोबो और मानव मिशन के लिए बेहद खास है। इसे 18 जून 2009 को एलियांस एटलस-5 रॉकेट (Atlas V Rocket) के जरिए लॉन्‍च किया गया था। एटलस-5 रॉकेट के माध्‍यम से Lunar Reconnaissance Orbiter समेत लूना क्रेटर ऑब्‍जरवेशन और एक सेंसिंग सेटेलाइट (Lunar Crater Observation and Sensing Satellite (LCROSS))को भी प्रक्षेपित किया गया था। 23 जून 2009 को LRO ने चांद के ऑर्बिटर में प्रवेश किया था और इसके साथ ही स्‍पेसक्राफ्ट ने भी अपना काम करना शुरू किया था। 15 सितंबर 2009 इसके एक्‍सप्‍लोरेशन मिशन (Space Exploration program) की शुरुआत हुई थी। इस मिशन का मकसद मानव को अंतरिक्ष में बसाने से जुड़ा था। ठीक एक साल बाद यह एक्‍सप्‍लोरेशन मिशन खत्‍म हो गया था। 

संपर्क साधने की कोशिश 

आपको यहां पर ये भी बता दें  कि इसरो (Indian Space Research Organisation) लैंडर विक्रम से संपर्क साधने की पूरी कोशिश कर रहा है, लेकिन इसमें अभी तक उसको सफलता हासिल नहीं हो सकी है। जैसे-जैसे दिन गुजरते जा रहे हैं वैसे-वैसे इसकी संभावना भी कम होती जा रही है। गौरतलब है कि लैंडर विक्रम 7 सितंबर को चांद के दो क्रेटर्स मजिनस सी (Maginus C) और सिमपेलियस एन (SimpeliusN) के बीच वाले मैदान में लगभग 70 डिग्री दक्षिणी अक्षांश पर उतरना था। इन दोनों के बीच की दूरी करीब लगभग 45 किमी है। लेकिन सतह छूने से दो किमी पहले ही यह अपने मार्ग से भटक गया और इसका संपर्क इसरो के मिशन कंट्रोल से टूट गया। फिलहाल लैंडर विक्रम चांद की सतह पर पूरी तरह से निर्जीव पड़ा है। 

बनी थी असमजंस की स्थिति 

विक्रम की पॉजीशन मिलने से पहले इसके चांद की सतह  (Moon’s surface) पर उतरने को लेकर असमजंस की स्थिति बनी हुई थी। लेकिन ऑर्बिटर से मिली थर्मल इमेज से यह साफ हो गया कि विक्रम चांद की सतह पर उतरा है। इससे पहले इस बात की भी आशंका लगाई जा रही थी कि विक्रम मार्ग से भटककर ब्रह्मांड में कहीं खो न गया हो।

नासा का मिशन बेहद खास

वैज्ञानिकों का मानना है कि नासा का यह मिशन बेहद खास है। LRO सर्च अभियान के लिए इसरो से मिले आंकड़ों का भी अध्‍ययन करेगा। इसरो को उम्‍मीद है कि यह अभियान विक्रम को दोबारा कामयाबी की राह पर अग्रसर करने में मददगार साबित हो सकता है। नासा इस पूरे मिशन पर निगाह रखे हुए हैं। आपको यहां पर ये भी बताना जरूरी होगा कि चांद पर उतरने की 15 मिनट की प्रक्रिया पहले से ही लैंडर विक्रम के लिए बेहद मुश्किल थी। इस मिशन पर पूरी दुनिया की निगाह लगी थी। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि उन्‍हें उस दिन का इंतजार है जब लैंडर विक्रम चांद की सतह पर उतरेगा। पूरी दुनिया ने चांद पर उतरने की भारत की कोशिश को काफी सराहा है। पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों ने माना है कि भारत का यह मिशन पूरी तरह से नाकामयाब नहीं रहा है, बल्कि इसने कई दूसरे द्वार खोल दिए हैं।

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Posted By: Kamal Verma

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