नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। अफगानिस्‍तान में तालिबान से शांतिवार्ता टूटने के बाद वहां चीजें काफी कुछ बदल गई हैं। अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप के इस फैसले के बाद तालिबान ने अमेरिकी जवानों पर और अधिक हमले की बात कहकर मामले को और गरमा दिया है। उस पर पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने यह कह कर अमेरिका को घेरने की कोशिश की है कि रूस को निकालने के लिए पहले अमेरिका ने जेहादी बनाए और अब उन्‍हें आतंकी बता रहा है। अफगानिस्‍तान में बदलती परिस्थितियों के बीच कुछ चीजें बेहद स्‍पष्‍टहो गई हैं। पहली तो ये कि पाकिस्‍तान ने इस बात को कुबूल कर लिया है कि उसकी जमीन पर आतंकी जन्‍म लेते है, उन्‍हें ट्रेनिंग दी जाती है और फिर एक्‍सपोर्ट भी किया जाता है। वहीं, पाकिस्‍तान को लेकर जो बातें भारत दुनिया के सामने हमेशा से कहता आया है वह भी सही साबित हुई हैं।

एक दूसरे को नापसंद करते हैं पाक, यूएस और रूस
अफगानिस्‍तान में पाकिस्‍तान, अमेरिका और रूस के बीच बने ट्राइंगिल में भी कुछ बातें बेहद समान हैं। दरअसल, अफगानिस्‍तान में शामिल रहे यह तीनों ही देश एक दूसरे को नापसंद करते हैं। अमेरिका और रूस के बीच वर्षों तक शीत युद्ध चला। इसके बाद दोनों के बीच स्‍पर्धा और वर्तमान में दोनों के रिश्‍ते किस कदर खराब हैं, ये भी किसी से छिपा नहीं रहा है। इसके अलावा पाकिस्‍तान और रूस के बीच किसी तरह के बेहतर रिश्‍तों की बात करना बेमानी है। ऐसा इसलिए क्‍योंकि रूस इस बात को काफी अच्‍छे से जानता है कि  से निकालने के लिए पाकिस्‍तान की जमीन और उसके लोगों का अमेरिका ने इस्‍तेमाल किया। इतना ही नहीं पाकिस्‍तान ने हर वो चीज करी जिससे रूस को नुकसान हो सकता था। वहीं अमेरिका और पाकिस्‍तान के संबंध तभी तक रहे जब तक अमेरिका को उसकी जरूरत रही। जाहिर सी बात है कि अब यह जरूरत पहले की तरह नहीं है। वहीं पाकिस्‍तान अफगानिस्‍तान के लिए अपनी जमीन के इस्‍तेमाल को सिर्फ इसी वजह से राजी हुआ था कि इसके बदले उसको लाखों डॉलर की राशि मिल रही थी। आपको बता दें कि अमेरिका और पाकिस्‍तान में वर्षों से रणनीतिक संबंध रहे हैं। इसके बाद भी अमेरिका ने रक्षा क्षेत्र में पाकिस्‍तान से कोई बड़ी डील आज तक नहीं की है। 

अफगानिस्‍तान में रूस के बाद अमेरिका
अफगानिस्‍तान पर कब्‍जे की कोशिश में पहले रूस ने यहां पर काफी तबाही मचाई थी। अमेरिका और रूस के बीच चले शीतयुद्ध का असर यहां पर भी दिखाई दिया था। यही वजह थी कि रूस को यहां से बाहर करने के लिए अमेरिका ने पाकिस्‍तान को अपने साथ मिलाकर तालिबान के गठन की जमीन तैयार की। इसके लिए अमेरिका ने न सिर्फ पैसे बल्कि पाकिस्‍तान और तालिबान को हथियारों के साथ ट्रेनिंग भी मुहैया करवाई। तालिबान को ट्रेनिंग देने वालों में सिर्फ चीन भी शामिल था। यहां पर अमेरिका की रणनीति काम कर गई और रूस को अफगानिस्‍तान से मुंह छिपाकर भागना पड़ा था। रूस के जाने के बाद यहां पर तालिबान ने अपने पैर पसारने शुरू किए। रूस के जाने के बाद अफगानिस्‍तान की चरमराई स्थिति में तालिबान ने इस पर अपना कब्‍जा कर कई इलाकों में अपनी सरकार तक बना ली थी। अफगानिस्तान की चुनी हुई सरकार तालिबान के सामने छोटी हो गई थी।

तालिबानी सरकार के कठोर कानून
जहां तक तालिबान की सरकार और उनके नियम कायदों की बात करें तो वह बेहद कठोर थे। सरेआम सिर काट कर या फिर फांसी या फिर सिर में गोली मारकर मौत की सजा का भी चलन आम हो चुका था। महिलाओं पर तालिबान के बेहद सख्‍त नियम थे। इन नियमों का पालन न करने पर उन्‍हें भी मौत की सजा दी जाती थी। मामूली सजा पर सरेआम कौड़े मारे जाते थे। 1990 के दशक में तालिबान ने अफगानिस्‍तान के 90 फीसद हिस्‍से पर कब्‍जा कर लिया था। अफगानिस्‍तान की राजनीतिक और आर्थिक उठापठक के बीच रूस और अमेरिका दोनों ही जिम्‍मेदार रहे हैं। 9/11 आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने यहां पर मौजूद तालिबान और अलकायदा को खत्‍म करने के लिए खरबों डॉलर खर्च किए हैं। रिपोर्ट बताती हैं कि अमेरिकी हमलों में बड़ी तादाद में आम आदमी भी हताहत हुए हैं। एमनेस्‍टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में इस बात का खुलासा पहले ही हो चुका है कि अफगानिस्‍तान से लेकर सीरिया तक फैले आतंकी गुटों तक अमेरिकी समेत जर्मन हथियारों की भी पहुंच आसानी से हो रही है। इतना ही नहीं एक रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि आतंकी अब फंड एकत्रित करने के लिए बिटक्‍वाइन जैसी करेंसी (Crypto Currency) का इस्‍तेमाल करने में लगे हैं। 

यून रिपोर्ट
इस संबंध में यूएन मिशन की रिपोर्ट बेहद खास है। इसके मुताबिक नाटो सेनाओं द्वारा यहां पर की गई एयर स्‍ट्राइक और आतंकियों के खिलाफ चलाए गए ऑपरेशन के दौरान पिछले छहमाह में 717 आम नागरिकों की मौत हुई हैं। इनमें से 403 लोगो की मौत अफगान सेना और 314 की मौत नाटो सेना के हाथों हुई हैं। वहीं, इन ऑपरेशंस में महज 531 तालीबानीआतंकी मारे गए हैं। हालांकि ये आंकड़ा पिछले वर्ष जनवरी-जून में हुई मौतों से करीब 43 फीसद कम है। इस वर्ष जनवरी से जून तक के बीच 20 अमेरिकी सैनिक भी यहां पर मारे जा चुके हैं। हाल ही में अमेरिकी जवानों पर हुआ हमला इस आंकड़े में शामिल नहीं है। गौरतलब है कि अफगानिस्‍तान में नाटो के करीब 13 हजार जवान तैनात हैं जिनमें से 9800 अकेले अमेरिका से ही हैं।

वार्ता में सबसे बड़ी रुकावट
तालिबान से चली वार्ता में जिसने सबसे बड़ी अड़चन डाली उस समझौते में अफगानिस्‍तान की भावी सरकार और उसमें तालिबान भागीदारी और अमेरिकी सेनाओं की वापसी पर कुछ नहीं था। यही वजह थी कि इसको नकार दिया गया। दूसरी बड़ी वजह अमेरिकी सेना पर हुआ आतंकी हमला था, जिसके बाद राष्‍ट्रपति ट्रंप ने वार्ता को रद कर दिया था। तालिबान फिलहाल वार्ता को दोबारा शुरू करने की कवायद के तहत रूस की तरफ देख रहा है। इसी वजह से तालिबान के एक प्रतिनिधिमंडल ने पिछले दिनों रूस में वरिष्‍ठ नेताओं से मुलाकात भी की थी। आपको बता दें कि इस शांतिवार्ता में अफगानिस्‍तान सरकार का कोई नुमांइदा नहीं था। इसको लेकर अफगानिस्‍तान के राष्‍ट्रपति ने नाराजगी भी जाहिर की थी। दूसरी तरफ तालिबान खुद भी सरकार से कोई सीधी बातचीत नहीं करना चाहता है।

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Posted By: Kamal Verma

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