क्या गंगा के लिए संकट बन सकती है नंदा देवी पर दफन 'मौत', 1965 में न्यूक्लियर डिवाइस खोने पर क्या बोले पूर्व AEC प्रमुख?
1965 में नंदा देवी पर खोए परमाणु उपकरण से खतरे की आशंकाओं को पूर्व AEC अध्यक्ष अनिल काकोडकर ने खारिज किया है। उन्होंने बताया कि प्लूटोनियम वाला कैप्सू ...और पढ़ें
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नंदा देवी चोटी। फोटो - X
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। 1965 में हिमालय की नंदा देवी चोटी पर परमाणु ऊर्जा से भरा उपकरण अचानक गायब हो गया था। इसे लेकर आज भी कयास लगाए जाते हैं कि ये हिमालय की बर्फ में कहीं दबा है, जो भविष्य में गंगा नदी समेत उत्तर भारत में रहने वाले लोगों के लिए खतरा बन सकता है। हालांकि, एटॉमिक एनर्जी कमीशन (AEC) के पूर्व अध्यक्ष अनिल काकोडकर ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।
अनिल काकोडकर से जब पूछा गया कि क्या खोए हुए परमाणु उपकरण से नंदा देवी में आपदा आने का खतरा है, तो इसपर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा, "बिल्कुल नहीं।"
AEC के पूर्व अध्यक्ष ने क्या कहा?
टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत के दौरान अनिल काकोडकर ने कहा, "मेरी समझ के अनुसार, इसके बिखरने की संभावना लगभग न के बराबर थी। प्लूटोनियम जिस परमाणु कैप्सूल में भरा गया था, वो काफी मजबूत था। इसलिए डरने की कोई बात नहीं है।"
अनिल काकोडकर के अनुसार,
चीन पर नजर रखने के लिए अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने नंदा देवी पर मिशन शुरू करने का प्लान बनाया था, जिसके लिए पावर सप्लाई की जरूरत थी। ऐसे में परमाणु ऊर्जा सबसे बेहतरीन विकल्प था। वहीं, परमाणु कैप्सूल बहुत मजबूत और जंग रहित था, जिससे प्लूटोनियम फैलने का सवाल ही नहीं उठता है।
क्या है पूरा माजरा?
बता दें कि 16 अक्टूबर 1964 में चीन के पहले परमाणु परीक्षण से पूरी दुनिया में खलबली मच गई थी। CIA ने चीन पर नजर रखने के लिए नंदा देवी की चोटी को चुना। अमेरिकी और भारतीय पर्वतारोहियों ने एक एंटीना, केबल और 13 किलोग्राम का जनरेटर लिया था। इस जनरेटर का नाम SNAP-19C था, जिसके अंदर 'प्लूटोनियम' भरा था।
तलाशी अभियान हुआ फेल
1965 में ये मिशन शुरू हुआ था। हालांकि, नंदा देवी पर बर्फीला तूफान आने के कारण पर्वतारोही इस उपकरण को चोटी पर छोड़कर वापस आ गए। वहीं, एक साल बाद जब पर्वतारोही दोबारा नंदा देवी की चोटी पर पहुंचे, तो उन्हें वो उपकरण नहीं मिला। तलाशी अभियान भी पूरी तरह से विफल रहा।
खतरे की घंटी
ये परमाणु उपकरण आज भी नंदा देवी की चोटी पर कहीं दफन है। हाल ही में उत्तराखंड पर्यटन मंत्रालय ने भी इसे लेकर चिंता व्यक्त की थी। बीजेपी नेता निशिकांत दुबे ने इसपर सवाल खड़े किए थे। रॉ के पूर्व अधिकारी आर.के यादव ने अपनी किताब 'गंगा में परमाणु बम' में भी इसपर चिंता जताई थी।


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