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    अराजनीतिक होते हुए राजनीतिक शिखर छूने वाले असाधारण मनमोहन, मनरेगा-RTI कानून उनके कार्यकाल की विरासत

    Updated: Fri, 27 Dec 2024 07:03 AM (IST)

    मनमोहन सिंह देश के ऐसे पहले प्रधानमंत्री रहे जिनकी कोई सघन राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी। राज्यसभा के सदस्य रहते हुए संप्रग की गठबंधन सरकार का नेतृत्व करने की उनकी कामयाबी इसका प्रमाण है। वस्तुत भारतीय राजनीति में मनमोहन सिंह के उदय का श्रेय कांग्रेस के दो बड़े नेताओं पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव और कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी को जाता है।

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    मनमोहन सिंह देश के ऐसे पहले प्रधानमंत्री रहे जिनकी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी (फोटो- एएनआई)

    संजय मिश्र, नई दिल्ली। देश में आर्थिक सुधारों के जनक माने जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के निधन के साथ ही भारत के राजनीतिक रंगमंच का एक नायाब सितारा सदा के लिए डूब गया है। गरीबी की पृष्ठभूमि में पैदा होकर बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश का लगातार 10 साल तक प्रधानमंत्री बने रहने की मनमोहन सिंह के असाधारण सफर ने इस दौरान कई पड़ाव और मंजिलों को छुआ।

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    मनमोहन सिंह की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी

    मनमोहन सिंह देश के ऐसे पहले प्रधानमंत्री रहे जिनकी कोई सघन राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी। राज्यसभा के सदस्य रहते हुए संप्रग की गठबंधन सरकार का नेतृत्व करने की उनकी कामयाबी इसका प्रमाण है। वस्तुत: भारतीय राजनीति में मनमोहन सिंह के उदय का श्रेय कांग्रेस के दो बड़े नेताओं पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव और कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी को जाता है।

    राजनीतिक इतिहास में उन्हें एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के खिताब मिला

    2004 के आम चुनाव के बाद जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद स्वीकार करने से इनकार कर दिया तो उनके सामने एक ऐसे नेता को यह जिम्मेदारी सौंपने की चुनौती थी जो न केवल इस पद के योग्य हो बल्कि कांग्रेस नेतृत्व की सर्वोच्चता के लिए कोई खतरा भी न हो। प्रणव मुखर्जी और अर्जुन सिंह जैसे दिग्गजों की दावेदारी के बीच सोनिया ने तब मनमोहन सिंह पर भरोसा किया और प्रधानमंत्री के रूप में अपने संपूर्ण कार्यकाल में उन्होंने इस भरोसे को कोई आंच नहीं आने दी। यही कारण है कि राजनीतिक इतिहास में उन्हें एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के खिताब से भी जाना जाता है।

    कांग्रेस को लगातार दूसरी बार सत्ता में लाने में अहम योगदान

    आर्थिक सुधारों, उदारीकरण और विकास के मानवीय चेहरे के विमर्श के साथ अर्थव्यवस्था को नई उंचाई देने के साथ-साथ विश्व मंच पर देश की साख को नया आयाम देने में उनका योगदान अविस्मरणीय है। वह 2008 और 2011-12 के गंभीर वैश्विक आर्थिक संकट से भारत को पूरी तरह बचाने के साथ-साथ दुनिया के संकटमोचक के रूप में उभरने का उदाहरण हो या फिर ब्रिक्स राष्ट्रों को एकजुट कर विकासशील देशों की आवाज मजबूत करने में उनका योगदान।

    मगर एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री होते हुए भी मनमोहन सिंह राजनीति की चुनौतियों और गहराइयों को बखूबी समझते थे। यह इससे भी जाहिर होता है कि 2004 में कांग्रेस के पास लोकसभा में 144 सीटें ही थीं और सहयोगी दलों के साथ वामपंथी पार्टियों के बाहरी समर्थन से तमाम दबावों के बीच संप्रग-1 सरकार में देश की आर्थिक और सामाजिक जीवन में बदलाव के लिए कई ऐतिहासिक फैसले लेने में हिचक नहीं दिखाई। कांग्रेस को 2009 में लगातार दूसरी बार पहले से ज्यादा सीटें दिलाकर सत्ता में लाने में उनके पहले कार्यकाल का बहुत बड़ा योगदान था। सूचना का अधिकार कानून, मनरेगा, शिक्षा का अधिकार से लेकर खाद्य सुरक्षा का अधिकार जैसे कार्य उनके कार्यकाल की ऐतिहासिक विरासत हैं।

    काम करके दिया अपनी आलोचना का जवाब

    मनमोहन सिंह को उनके राजनीतिक विरोधी कई बार कठपुतली और कमजोर बताने से परहेज नहीं करते थे। लेकिन मृदुभाषी और संयम की मर्यादा का अनूठा उदाहरण पेश करते हुए उन्होंने इसका प्रतिवाद करने की बजाय अपने कार्यों से इसका माकूल जवाब दिया। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2008 में अमेरिका के साथ परमाणु समझौते का उनका फैसला रहा जब वामपंथी दलों के समर्थन वापसी की धमकी-दबाव में न आते हुए इसे सिरे चढ़ाया।

    वामपंथी दलों ने समर्थन वापस ले लिया तो सोनिया गांधी के साथ मिलकर समाजवादी पार्टी का समर्थन जुटाकर न केवल सरकार बचाई बल्कि ऐतिहासिक परमाणु समझौते को मुकाम तक पहुंचाया। भले ही राजनीति में मनमोहन सिंह की इंट्री करीब 60 साल की उम्र में हुई मगर उनकी सियासी दूरदर्शिता और गहराई का पता इससे चलता है कि जब जम्मू-कश्मीर में पीडीपी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ गठबंधन कर सरकार बनाने की जटिल पहल हुई थी तो सोनिया गांधी ने अहमद पटेल के साथ मनमोहन सिंह को भेजा था। इसके बाद ही 2004 के आम चुनाव से एक साल पूर्व उन्हें राज्यसभा में नेता विपक्ष बनाया।

    प्रणब दा को सर कहकर मना लेते थे

    जटिल हालात में भी बेहतर नतीजे निकालने की उनकी क्षमता की कांग्रेस में अक्सर चर्चाएं होती हैं। विशेषकर पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत प्रणव मुखर्जी के साथ उनके रिश्ते ऐसे थे कि प्रधानमंत्री होते हुए भी मनमोहन सिंह कई बार प्रणब मुखर्जी के गुस्से को काबू में करने के लिए उन्हें सर बुलाते थे। उनके सर बोलते ही प्रणब बाबू नरम पड़ जाते थे और कहते थे कि आप देश के प्रधानमंत्री होकर मुझे सर क्यों कहते हैं। मगर वास्तविकता यह भी थी कि मनमोहन सिंह अपने कैबिनेट के सहयोगी के राजनीतिक कद और अनुभव का पूरा सम्मान करते थे। इसीलिए संप्रग सरकार में जितने भी मंत्री समूह बने उसकी अध्यक्षता प्रणव बाबू को ही सौंपी ताकि उन्हें पीएम पद पर न होने की कसक महसूस न होती रहे।

    बदल कर रख दी आर्थिक विकास की धारा

    राजनीति में मनमोहन सिंह का आगमन परिस्थिति जन्य चुनौतियों का परिणाम रहा जब नरसिंह राव ने 1991 में प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली तब देश लगभग कंगाली के मुहाने पर था। भारत का अधिकांश सोना विदेश में गिरवी रखा जा चुका था और कर्ज का डिफाल्टर बनने की नौबत थी । ऐसे में राव ने रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर आइजी पटेल को पहले वित्तमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया मगर उन्होंने इनकार कर दिया तब मनमोहन सिंह को भारत को आर्थिक संकट से निकालने की पेशकश की। इस चुनौती को मनमोहन सिंह ने न केवल स्वीकार किया बल्कि लगभग पांच दशक पुरानी भारत की आर्थिक विकास की धारा को ही पूरी तरह बदल दिया। हालांकि तब भी विपक्ष ने उन पर आक्रमणों की बौछार की मगर नरसिंह राव के योगदान को भी इसलिए नहीं भूला जाएगा क्योंकि उन्होंने अपने वित्तमंत्री रहे मनमोहन सिंह पर लगातार पांच साल तक विश्वास किया।

    1999 में हार गए थे लोकसभा चुनाव

    देश की राजनीति में मनमोहन सिंह ने निसंदेह अजातशत्रु के तौर पर एक लंबी लकीर खींच दी है लेकिन चुनावी राजनीति में उनका पहला और एकमात्र दांव नाकाम रहा था। 1999 के लोकसभा चुनाव में दक्षिण दिल्ली से कांग्रेस ने उन्हें उम्मीदवार बनाया मगर भाजपा के विजय कुमार मलहोत्रा से वे चुनाव हार गए। हालांकि यह चुनावी पराजय उनके राजनीतिक शिखर की मंजिल में कभी बाधा नहीं बनी। वस्तुत: मनमोहन सिंह का जाना आधुनिक भारत के राजनीतिक इतिहास की एक अपूरणीय क्षति है इसमें संदेह नहीं।

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