'मनोरंजन के लिए नहीं होते विरोध प्रदर्शन', मद्रास हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला; अदालत ने कहा- राजनीतिक दलों की मनमर्जी नहीं चलेगी
मद्रास हाई कोर्ट ने विरोध प्रदर्शनों पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि ये मनोरंजन के लिए नहीं होते। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रदर्शन राजनैतिक दलों की मनमर्जी से नहीं हो सकते क्योंकि उनसे आम जनता की स्वतंत्रता बाधित होती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि विरोध प्रदर्शनों से जनता को असुविधा नहीं होनी चाहिए।

माला दीक्षित, नई दिल्ली। विरोध प्रदर्शनों से आम जनता को होने वाली परेशानियों पर मद्रास हाई कोर्ट ने राजनैतिक दलों को नसीहत देने वाला अहम फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने कहा है कि विरोध प्रदर्शन मनोरंजन के लिए नहीं होते। विरोध प्रदर्शन राजनैतिक दलों की इच्छा और मनमर्जी के मुताबिक नहीं हो सकते।
उच्च न्यायालय ने कहा है कि राजनैतिक दलों की आमजनता के प्रति भी कुछ जिम्मेदारियां होती हैं जो उनके विरोध प्रदर्शनों से डिस्टर्ब होती है। प्रदर्शन के अधिकार से आम जनता का अधिकार बाधित नहीं होना चाहिए जो उन प्रदर्शनों से संबद्ध नहीं हैं। हाई कोर्ट ने यहां तक कहा है कि प्रदर्शन के अधिकार में जनता को असुविधा देने का अधिकार शामिल नहीं है।
'विरोध प्रदर्शन मनोरंजन के लिए नहीं होते'
राजनैतिक दलों के विरोध प्रदर्शन के अधिकार और आमजनता के स्वतंत्रता से आवागमन और शांतिपूर्ण ढंग से रहने के अधिकार पर यह अहम फैसला मद्रास हाई कोर्ट के न्यायाधीश बी. पुगालेन्धी ने एक राजनैतिक दल के राज्य संयोजक जे. ईश्वरन की याचिका पर गत नौ जुलाई को दिया। इस मामले में एक व्यक्ति अजीत कुमार की मौत हो जाने के विरोध में राजनैतिक दल विरोध प्रदर्शन करना चाहता था लेकिन जब तमिलनाडु के शिवगंगाई जिले की पुलिस ने इजाजत नहीं दी तो उसने हाई कोर्ट में रिट याचिका दाखिल की। जिस पर यह फैसला आया है।
फैसले में हाई कोर्ट ने दर्ज किया है कि इसी राजनैतिक दल ने इसी स्थान पर पांच दिन प्रोटेस्ट किया था और अब फिर पांच दिन बाद वो उसी स्थान पर उसी कारण से फिर प्रोटेस्ट करना चाहता है। कोर्ट ने कहा कि विरोध प्रदर्शन मनोरंजन के लिए नहीं होते। विरोध प्रदर्शन राजनैतिक दलों की इच्छा और मनमर्जी के मुताबिक नहीं हो सकते। राजनैतिक दलों की आमजनता के प्रति भी कुछ जिम्मेदारियां होती हैं जो उनके विरोध प्रदर्शनों से प्रभावित होती है। कोर्ट ने कहा अगर कोई प्रदर्शन किया जाता है तो निश्चित तौर पर आम जनता का स्वतंत्र रूप से आवागमन का अधिकार प्रभावित होता है और प्रदर्शन स्थल के आस पड़ोस में रहने वाले लोग डिस्टर्ब होते हैं।
'आम जनता का अधिकार बाधित नहीं होना चाहिए'
हाई कोर्ट ने फैसले में विरोध प्रदर्शन के अधिकार और उससे प्रभावित होने वाली आम जनता पर दिए गए सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व फैसलों का जिक्र किया है। हाई कोर्ट ने कहा है कि पूर्व फैसलों से साबित होता है कि प्रदर्शन का अधिकार है लेकिन ये अधिकार राज्य द्वारा लगाए गए तर्कसंगत नियंत्रण के अधीन है। उच्च न्यायालय ने कहा कि प्रदर्शन के समय आम जनता की सुविधा का ध्यान रखा जाना चाहिए जो उन प्रदर्शनों से संबद्ध नहीं हैं। प्रदर्शन के अधिकार से आम जनता का अधिकार बाधित नहीं होना चाहिए।
प्रदर्शन के अधिकार में जनता को असुविधा देने का अधिकार शामिल नहीं है। प्रदर्शन के अधिकार का इस्तेमाल आमजनता को लगातार परेशान या असामंजस्य पैदा करने के लिए लापरवाही से नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक स्थान मूलतः आमजनता के उपयोग के लिए होते हैं। यद्यपि ऐसे स्थलों पर विरोध प्रर्दशन करना एक मूल्यवान लोकतांत्रिक साधन है, फिर भी जिस उद्देश्य के लिए ये स्थान बनाए गए हैं उसे नहीं भूलना चाहिए।
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि कोई भी व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता कि उसे बिना किसी प्रतिबंध के एक ही स्थान पर बार-बार विरोध प्रदर्शन की अनुमति दी जानी चाहिए। मद्रास हाई कोर्ट के इस फैसले से एक डेढ़ सप्ताह पहले कलकत्ता हाई कोर्ट ने भी एक राजनैतिक दल को विरोध रैली निकालने की इजाजत देते हुए शर्त लगाई थी कि रैली सड़क के एक तिहाई हिस्से पर ही निकलेगी दो तिहाई सड़क वाहनों के आवागमन के लिए खाली रहेगी।
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